परमाणु संधि था बड़ा तमाशा!


जर्मनी के हैम्बर्ग में जी-20 सम्मेलन सम्पन्न हो गया। राष्ट्राध्यक्ष अपने-अपने देशों को लौट गए। इस सम्मेलन में ‘क्या खोया-क्या पाया’ का विश्लेषण करने का समय है। जहां जलवायु पर पेरिस समझौते से अलग हटने के फैसले पर अमेरिका अलग-थलग पड़ा वहीं विश्व की 20 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों ने आतंकवाद और संरक्षणवाद से मिलकर मुकाबला करने की रणनीति पर चर्चा की। दूसरी तरफ न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आस्ट्रिया, ब्राजील, मैक्सिको, दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड की पहल पर दुनिया के 122 देशों ने परमाणु हथियारों के बहिष्कार की अहम संधि के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यद्यपि इस संधि को ऐतिहासिक करार दिया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे एलेन गोम्ज ने समझौते को ऐतिहासिक बताते कहा कि परमाणु हथियारों से दुनिया को मुक्त करने की दिशा में हमने पहला बीज बोया है। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम हमले के बाद से पिछले 70 वर्षों से दुनिया परमाणु हथियारों के बहिष्कार के लिए इस तरह की एक बड़ी संधि का इंतजार कर रही थी। प्रस्तावित समझौते के सदस्य देशों ने परमाणु हथियारों के विकास, परीक्षण, विनिर्माण, भंडारण, परमाणु प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और दूसरों के खिलाफ इसके इस्तेमाल पर पूर्ण रोक लगाने की प्रतिबद्धता जताई गई है। ऐसी संधि का प्रस्ताव पारित हो जाना एक अच्छी शुरूआत माना जा सकता है।

क्या इससे विश्व परमाणु हथियारों से मुक्त हो जाएगा? बिल्कुल नहीं, क्योंकि परमाणु सम्पन्न राष्ट्र अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, भारत, इस्राइल, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया तो मतदान के समय अनुपस्थित रहे।हैरानी की बात तो यह है कि परमाणु बम की सबसे बड़ी विभीषिका झेलने वाले जापान ने भी सम्मेलन का बहिष्कार किया। नीदरलैंड के अलावा सभी नाटो देशों ने भी इस संधि का बहिष्कार किया। परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयास तो बहुत किए गए, तमाशे भी हुए लेकिन ऐसी संधि का क्या लाभ जिससे दिग्गज परमाणु सम्पन्न देशों ने किनारा कर लिया हो। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहर मूक गवाह हैं जिनमें परमाणु ऊर्जा का नग्न नर्तन हुआ था। कोई 7 दशक बीत गए परन्तु आज भी वहां आनुवांशिक विसंगतियां परिलक्षित हो रही हैं। किसी जापानी से इसकी व्यथा सुनें। वह आपको बताएगा कि परमाणु ऊर्जा है क्या।स सबसे पहले पोलैंड के विदेशमंत्री आदाम रापाकी ने 14 फरवरी 1958 को अपनी योजना सुरक्षा परिषद में रखी कि कैसे परमाणु हथियारों पर अंकुश लगाकर इसे नई दिशा दी जा सकती है।स इसके बाद संशोधित रापाकी योजना बनी।स पहली बार परमाणु निषेध संधि यानी परमाणु हथियार खत्म करने का समझौता 1963 में हुआ था। इसे अमेरिका, रूस और ब्रिटेन के द्वारा हस्ताक्षरित किया गया।स 1968 में परमाणु अप्रसार संधि यानी ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के अलावा अगर कोई भी विश्व का अन्य देश परमाणु कार्यक्रम शुरू करेगा तो उसके यहां पर ये महाशक्तियां अपनी टीम निरीक्षण के लिए भेजेंगी।

भारत ने इस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। भारत की अपनी उलझनें भी थीं। स्वभाव से सच्चा और स्वाभिमानी राष्ट्र होने के कारण अगर वह इस संधि पर हस्ताक्षर कर देता तो उसे इसके अनुशासन में बंध जाना पड़ता जबकि वह नग्न आंखों से पाकिस्तान की हरकतें देख रहा था और चीन की भी। तब तक भारत का चीन और पाकिस्तान दोनों से युद्ध हो चुका था। भारत ने इस संधि को भेदभावपूर्ण माना।इसके बाद यह भांडा फूटा कि चीन ने पाकिस्तान को एम-11 मिसाइल के सारे कलपुर्जे चोरी से पहुंचा दिए हैं जबकि 1994 में मिसाइल प्रौद्योगिकी कंट्रोल रिजीम के अंतर्गत उसने ऐसा न करने की कसम खाई थी। भारत जानता था कि पाकिस्तान की नापाक हरकतों की वजह से न जाने कब किस रूप में मानवता को सजा भुगतनी पड़े क्योंकि पाकिस्तान जैसा देश कभी किसी का सगा नहीं होता। भारत की मानवता आज तक पाक की हरकतों के कारण कराह रही है। पाक परमाणु बम के जनक कादिर खान ने मुशर्रफ के इशारे पर पूरी तकनीक उत्तर कोरिया को ब्लैक में बेच दी। चीन ने पाकिस्तान को भस्मासुर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

भारत दुनिया भर को पाक के बारे में बताता रहा लेकिन अमेरिका और उनके समर्थित देशों ने हमारी एक न सुनी। हमारी इस बात के लिए निन्दा की गई कि भारत एनपीटी या सीटीबीटी जैसे मानवीय समझौतों पर दस्तखत क्यों नहीं करता। बड़े मुल्कों को अपनी-अपनी पड़ी थी। वह भारत के हित क्यों देखते, उन्हें तो एशिया के हितों से कोई मतलब नहीं था। पाकिस्तान का परमाणु ऊर्जा प्राप्त करना भारत के लिए सिरदर्द तो है ही, वह कभी-कभी परमाणु युद्ध की धमकी तक दे डालता है। अमेरिका ने भी पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की बल्कि उसे अपनी गोद में बैठा लिया लेकिन पाकिस्तान ने अमेरिका को कितनी जबर्दस्त चोट पहुंचाई, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। अमेरिका अफगानिस्तान के घाव आज तक सहन कर रहा है और लादेन को पाकिस्तान ने ही अपने यहां छिपा रखा था। उत्तर कोरिया आज अमेरिका को ही चुनौती दे रहा है। काश! अमेरिका ने पाक की नकेल कसी होती। भारत ने परमाणु संधि का बहिष्कार कर कहा है कि यह संधि निरस्त्रीकरण की समग्र व्यवस्था कायम नहीं करती। परमाणु हथियारों का वैश्विक विलोपन और अन्तर्राष्ट्रीय सत्यापन जरूरी है।अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस कह रहे हैं कि यह संधि उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम से पैदा हुए गम्भीर खतरों को लेकर कोई समाधान नहीं पेश करती। इसलिए यह संधि व्यर्थ है। यह संधि एक बड़ा तमाशा ही साबित हुई। पूरे विश्व ने अमेरिका का इराक में खेला गया विध्वंस का खेल भी देखा है। वह भी रासायनिक हथियारों के नाम पर जबकि इराक में एक भी रासायनिक हथियार नहीं मिला था। इसलिए भारत ने संधि से बाहर रहकर बेहतर फैसला लिया है। हमें अपनी सुरक्षा के लिए कड़े फैसले लेने ही होंगे तभी भारत की सीमाओं की रक्षा की जा सकेगी।

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