फिर हुआ आस्था पर प्रहार


केसर की क्यारी हुई दुर्गन्धों के नाम
बारूदी वातावरण करता है बदनाम
घाटी में बारूद के इतने बड़े गुबार
मानवता का सांस लेना है दुश्वार
कश्मीर घाटी डरी, सहमी है खामोश
गुमसुम है डल झील भी, व्यक्त कर रही रोष
यह कैसा आतंकमय, वातावरण उदास
है कोई जो कर सके, पीड़ा का एहसास
उद्वेलित आक्रोष से, अमरनाथ का भक्त
कब तक और बहाओगे निर्दोषों का रक्त।
अमरनाथ यात्रा के दौरान आतंकवादियों द्वारा किया गया हमला बड़े खतरे का संकेत माना जा सकता है। यह हमला समूचे भारत के हिन्दुओं की आस्था पर प्रहार है, यह कश्मीर की सांझी विरासत और परम्परा पर हमला है। 18 वर्ष पहले अटल बिहारी वाजपेयी शासन के दौरान भी आतंकवादियों ने हमला कर 30 तीर्थ यात्रियों की हत्या कर दी थी। 17 वर्ष से आतंकवादियों ने कभी अमरनाथ यात्रा को निशाना नहीं बनाया। अमरनाथ यात्रा न केवल कश्मीर की परम्परा है बल्कि वहां के पर्यटन को मजबूती देने वाली है। अमरनाथ गुफा की खोज भी पहली बार 1850 में एक मुस्लिम चरवाहे बूटा मलिक ने की थी। इसलिये दशनामी अखाड़े और पुरोहित सभा मट्टन के साथ मलिक के परिवार को भी इस गुफा का संरक्षक बनाया गया। यानी यह स्थल केवल हिन्दुओं के लिये नहीं बल्कि घाटी के मुस्लिमों के लिये भी काफी महत्व रखता है। यह यात्रा ऋषि कश्यप की भूमि कश्मीर में साम्प्रदायिक सद्भाव की प्रतीक है।

अमरनाथ यात्रा को हतोत्साहित करने का अभियान कोई नया नहीं है। इस यात्रा को निशाने पर लेने की पहली कोशिश 1990 के उस दौर में हुई थी जब घाटी में आतंक उभार पर था। सन् 1993 में आतंकी संगठन हरकत-उल-अंसार ने इस यात्रा पर हमले की कोशिश की थी, उसने अमरनाथ यात्रा पर प्रतिबंध का ऐलान भी किया था लेकिन स्थानीय आतंकियों और लोगों की मदद नहीं मिलने से उसकी यह साजिश कामयाब नहीं हुई थी। देशभर से लोग अमरनाथ यात्रा के लिये उमड़ पड़े थे। घाटी से कश्मीर की मूल संस्कृति के प्रतीक कश्मीरी पंडितों के बलात् निष्कासन के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों का एक लक्ष्य तो कब का पूरा हो चुका। घाटी हिन्दुओं से खाली हो चुकी है। हिन्दुओं के अधिकांश पूजा स्थल ध्वस्त कर दिये गये परन्तु अनेक आराध्य स्थल अभी भी जीवंत हैं। ये आराध्य स्थल एक बार फिर जिहादियों के निशाने पर हैं। अमरनाथ यात्रियों पर हमला भारत की बहुलतावादी सनातन संस्कृति के खिलाफ है और इसका मूलाधार कश्मीर समस्या और कट्टरवादी इस्लाम है।

इससे पूर्व सन् 2008 में यात्रा की अवधि 55 दिनों से घटाकर 15 दिनों तक करने के लिये सड़कों पर बड़े पैमाने पर उपद्रव मचाया गया था। तब तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिये अमरनाथ श्राइन बोर्ड को उपलब्ध कराई गई 40 एकड़ जमीन भी अलगाववादियों को रास नहीं आई थी। भारत की बहुलतावादी संस्कृति का रक्षक होने का दावा करने वाले तथाकथित धर्मनिरक्षेप अधिष्ठान ने जमीन आवंटन को निरस्त कर अलगाववादियों का हौंसला बढ़ाने का ही काम किया था। एक बार तो जम्मू-कश्मीर सरकार ने अमरनाथ यात्रा और वैष्णो देवी यात्रा के लिये राज्य में प्रवेश करने वाले दूसरे राज्यों के वाहनों पर भारी-भरकम प्रवेश शुल्क लगा दिया था। तब देशभर में इसका विरोध हुआ था। क्या अजमेर शरीफ, हाजी अली या मुसलमानों की अन्य इबादतगाहों के लिये ऐसी कोई व्यवस्था क्या कभी संभव है? तो ऐसी कोशिश क्यों की गई।

यात्रा मार्ग पर भंडारा लगाने वाले आयोजकों से शुल्क पहले से ही वसूला जाता है। क्या दुनिया में ऐसा कोई देश होगा जहां उस देश के बहुसंख्यकों का ही सर्वाधिक दोहन होता हो। इतिहास गवाह है कि जब भी जम्मू-कश्मीर में प्राकृतिक आपदायें आईं तब-तब पूरा देश उनकी मदद के लिये उठ खड़ा हुआ। पिछले 17 वर्षों में घाटी में विरोध प्रदर्शन, पत्थरबाजी के दौर में भी कभी इस यात्रा को निशाना नहीं बनाया गया, इसलिये ताजा हमले को नये खतरे का संकेत माना जा रहा है। इस हमले ने इतना तो साबित कर दिया है कि हमारे सुरक्षा प्रबन्धों में आज तक वह बात परिलक्षित नहीं हो पा रही जिसके आधार पर हम यह कह सकें कि अमरनाथ यात्रा पूर्णत: निष्कंटक हो गई है।

ड्रोन, सैटेलाइट्स, सीसीटीवी कैमरों से निगरानी और हजारों जवानों की तैनाती के बावजूद आतंकी हमला करने में कामयाब हो गये। इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं सुरक्षा व्यवस्था में खामी रही। आस्था पर आतंक का कोई भय नहीं, यात्रा फिर शुरू हो गई है। बाबा बर्फानी के भक्तों ने आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब दे दिया है। अब सुरक्षा बलों को अपनी कार्रवाई करनी है। मनुष्यों और भेडिय़ों में कोई बात नहीं हो सकती। भेडिय़ा कभी शाकाहारी नहीं हो सकता। वह केवल खून पीता है। निदान एक ही है ‘भेडिय़े का वध’। भेडिय़े के शुभचिंतक जो घाटी में हैं, जो पाक के इशारों पर नाचते हैं, उनका क्या हश्र हो, इसका फैसला सरकार करे।

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