मायावती के इस्तीफे का सच


बहुजन समाज पार्टी की नेता सुश्री मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा देने का फैसला करके अपने जातिवादी एजैंडे को पुन: केन्द्र में लाने का प्रयास किया है। सक्रिय राजनीतिज्ञ जब इस प्रकार की ‘कलाबाजी’ करते हैं तो उनका लक्ष्य खुद को ‘महिमामंडित’ करने का रहता है जिससे आम जनता का ध्यान उनकी तरफ तेजी से खिंच सके और उनकी राजनीति में सार्थकता बनी रहे। दरअसल यह मायावती के वजूद की लड़ाई है जिसे वह पुन: जातिवादी जामा पहना कर जीतना चाहती हैं। इसका विपक्ष की एकता से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि मायावती दलितों को ‘वोट बैंक’ में परिवर्तित करके अपनी ऐसी ‘सम्पत्ति’ समझ बैठी हैं जिसका चुनावी राजनीति में उन्होंने एक ‘ब्लैंक चैक’ की तरह पूरी बेशर्मी के साथ किसी राजनीतिक कारोबारी के रूप में इस्तेमाल किया। इसका पर्दाफाश होने पर दलितों ने ही उनसे पल्ला झाडऩा शुरू कर दिया जिससे उनकी राजनीति धराशायी हो गई, जिसका प्रमाण हमें उत्तर प्रदेश में हुए तीन महीने पहले चुनावों से मिला मगर वह ‘अंगुली’ कटा कर ‘शहीद’ होना चाहती हैं क्योंकि उनका राज्यसभा का कार्यकाल केवल नौ महीने का रह गया है और वह पुन: राज्यसभा में चुन कर भी नहीं आ सकतीं क्योंकि उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी के विधायकों की संख्या इतनी कम रह गई है कि वह चुनाव नहीं जीत सकतीं। अत: दलितों पर कथित अत्याचार के नाम पर उन्होंने ‘शहादत’ देने का ‘मायाजाल’ रच डाला परन्तु यह भी सत्य है कि मायावती ने उत्तर प्रदेश में दलितों के मन में सत्ता में सीधे भागीदारी का भाव जागृत किया और इस देश के महान लोकतंत्र में उनकी ताकत का आभास कराया।

उन्होंने अपनी विरासत खुद तैयार की और इस तरह की कि ‘महलों और झोपड़ी’ की लड़ाई में विजयश्री ने ‘दलित की बेटी’ का वरण किया परन्तु वह इस शानदार विरासत को राजनीतिक ‘तिजारत’ की भेंट चढ़ा बैठीं जिससे दलित का बेटा और बेटी जहां थे, जैसे थे वैसे ही रहे। उनकी सामाजिक-आर्थिक हालत पहले से भी बदतर होती गई जिसकी ङ्क्षचता मायावती ने अपने वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने की गरज से नहीं की। वह सत्ता की सौदेबाजी में दलितों के समर्थन की तिजारत करने में मशगूल हो गईं जिसका परिणाम अन्तत: वही होना था जो हुआ है क्योंकि किसी भी वर्ग या जमात को हमेशा के लिए कोई भी मूर्ख नहीं बना सकता है। यह सिद्धांत केवल मायावती पर ही नहीं बल्कि प्रत्येक राजनीतिक दल और नेता पर लागू होता है क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम रूप से सबसे ताकतवर वही व्यक्ति सिद्ध होता है जिसे ‘एक वोट’ का अधिकार मिला हुआ है। मायावती, जो बाबा साहेब अम्बेडकर की स्वयं को अनुयायी बताती हैं, बाबा साहेब के ही उस अमर वाक्य के विपरीत व्यवहार करने लगीं जो उन्होंने 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान तैयार करके इसे संविधान सभा को सौंपते हुए कहा था कि हमने राजनीतिक आजादी प्राप्त कर ली है मगर सामाजिक-आर्थिक आजादी के बिना यह स्वतंत्रता अधूरी रहेगी और इसके लिए हमें पूरे भारत में आर्थिक समानता के उपाय करने पड़ेंगे जिससे सामाजिक स्तर पर गरीबों का सशक्तिकरण हो सके वरना इस राजनीतिक आजादी के वर्गगत व जातिगत ठेकेदार पैदा होकर इस आजादी की सौदेबाजी करने में सक्षम हो सकते हैं।

हमने जिस एक वोट का अधिकार बिना भेदभाव के दिया है उसके न्यायोचित प्रयोग करने की ताकत भी इस देश के लोगों को देने के लिए सामाजिक व आर्थिक असमानता को दूर करने की लड़ाई लडऩी होगी।” बाबा साहेब देश के प्रथम कानून मंत्री के रूप में जो ‘हिन्दू कोड बिल’ लाए थे उसका उद्देश्य अद्र्ध सामंती मानसिकता में जी रहे हिन्दू परिवारों में व्यक्ति की निजी प्रतिष्ठा और सम्मान को सर्वोच्च रखना था और इसमें महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देना था मगर उस समय इसका विरोध होने पर यह पारित नहीं हो सका था जिससे निराश होकर बाबा साहेब ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था मगर भारत का यह भी पुख्ता इतिहास है कि जब अक्तूबर 1951 से मार्च 1952 तक पहली लोकसभा के चुनाव हुए तो स्व. पं. जवाहर लाल नेहरू ने हिन्दू कोड बिल को चुनावों का मुख्य मुद्दा बनाकर प्रचार किया कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो इस विधेयक के विभिन्न प्रावधानों को लागू किया जाएगा और कानून बनाया जाएगा। इसलिए 1952 से 1956 के बीच बाबा साहेब के हिन्दू कोड बिल को चार भागों में विभक्त करके अलग-अलग विधेयक संसद ने पारित किए। कहने का मतलब यह है कि यह देश कभी भी राष्ट्रहित के मुद्दों से पीछे नहीं हटा है।

अगर दलितों के साथ अन्याय कहीं भी होता है तो देश की वर्तमान मोदी सरकार को सख्त से सख्त कदम उठाने से गुरेज नहीं होना चाहिए क्योंकि दलित इस देश का ऐसा महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जिसके बिना भारत संगठित रह ही नहीं सकता। इस हकीकत को पहचानते हुए ही महात्मा गांधी ने 1932 में आमरण अनशन किया था जिसके बाद बाबा साहेब से ‘पूना पैक्ट’ हुआ था। यदि देश का प्रधानमंत्री आज यह कहता है कि दलितों पर हमला करने से पहले मुझ पर हमला करो तो संसद के चालू सत्र में ही मायावती को इस मुद्दे पर बहस शुरू करा कर अपना पक्ष मजबूती के साथ रखना चाहिए था। मगर उन्होंने निजी शोहरत का रास्ता चुना। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि भारत में सामाजिक अन्याय को खत्म करने के लिए कथित ऊंची जातियों के नेताओं ने ही संघर्ष करने में पहल की है। चाहे वह तमिलनाडु की स्वतंत्रता पूर्व की जस्टिस पार्टी रही हो या कांग्रेस अथवा हिन्दू एकता की पैरवी करने वाले विभिन्न संगठन। महामना मालवीय को तो हरिजनों के साथ समता स्थापित करने के लिए ही गौड़ ब्राह्मण सभा ने निष्कासित तक कर दिया था। डा. राम मनोहर लोहिया ने नेहरू के जीवनकाल में ही पिछड़ों व दलितों को राजनीति में ऊंचे स्थान देने का अभियान चलाया।

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