पर्यावरण संकट से बचाएगा वैदिक चिंतन


आज दुनियाभर में ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाया जा रहा है। वैसे भारत के लिए 5 जून का दिन हमेशा काफी महत्वपूर्ण रहता है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते से अलग होने की घोषणा के बाद आज के दिन ने भारतीयों के लिए चिंतन-मंथन दिवस का स्वरूप ले लिया है। सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले अमेरिका का पेरिस समझौते से हाथ खींचना बहुत दुखद है, इससे भी दुखद है ट्रंप द्वारा इसका ठीकरा भारत के सिर फोडऩा। इस फैसले के पीछे अमेरिका की वह दादागिरी भी साफ तौर पर झलकती है जिसके तहत वह हमेशा से ही अपने ऊपर किसी भी तरह के प्रतिबंध लगाने के खिलाफ रहा है। पर्यावरण और धरती के बढ़ते तापमान के पीछे विश्व के विकसित देश कहीं भी पीछे नहीं हैं। बार-बार भारत समेत अन्य विकासशील देशों पर इसका ठीकरा फोड़ते आए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय वेदों का उद्धरण देते हुए कहा कि ‘भावी पीढ़ी के लिए एक खूबसूरत और शुद्ध धरती छोडऩा हम सभी की जिम्मेदारी है। भारत कार्बन उत्सर्जन के कड़े मानकों को स्वीकार करने के लिए वचनबद्ध है।

पेरिस समझौते के पक्ष और विपक्ष में होने का सवाल नहीं है बल्कि भारत भावी पीढ़ी के साथ है। दुनियाभर के देश ट्रंप की आलोचना कर रहे हैं। भारत विकासशील देश है, उसकी अपनी विवशताएं भी हैं। दरअसल भारत विश्व में ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है। इस कड़ी में चीन पहले नम्बर पर है। भारत विश्व की 4.1 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन करने के लिए जिम्मेदार है। यह आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। पिछले 21 वर्षों से सीओपी बैठकों में विवाद का विषय सदस्य देशों के बीच जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी और इसके आर्थिक बोझ का रहा है। विकासशील और विकसित देशों के बीच प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में बड़ा अंतर है। भारत भी जलवायु परिवर्तन के खतरों से प्रभावित होने वाले देशों में से एक है। कार्बन उत्सर्जन में कटौती का असर भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक पड़ेगा। इसके बावजूद भारत ने अपनी उत्सर्जन तीव्रता को 2030 तक 2005 के मुकाबले 33-35 फीसदी कम करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए कृषि, जल संसाधन, तटीय क्षेत्रों, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर भारी निवेश की जरूरत है। सरकार इस दिशा में काम कर रही है। स्वच्छ ऊर्जा, सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

हमारी समस्या यह है कि हम वर्ष के 365 दिन प्रकृति के प्रति अमानवीय व्यवहार करते हैं। इस पर्यावरण के प्रति उदासीन और संवेदन शून्य हो चुके हैं। हमारे पास शुद्ध पेयजल नहीं, सांस लेने के लिए शुद्ध हवा तक नहीं। जंगल कट चुके हैं, उनकी जगह कंक्रीट की अट्टालिकाएं खड़ी हो चुकी हैं। कभी जल से लबालब भरे ताल, पोखर, झीलें और अन्य जल स्रोत सूख चुके हैं। औद्योगिकरण ने खेत-खलिहान और वन्य क्षेत्र निगल लिए हैं। वन्य जीवों का आशियाना छिन गया है और वह शहरों में घुसकर उत्पात मचा रहे हैं। उद्योग धुआं और जहरीले रसायन उगल रहे हैं और प्राणवायु को प्रदूषित कर रहे हैं। यह सब खतरे की घंटी है। गांवों से शहरों की ओर लगातार पलायन के कारण शहरों पर बोझ बढ़ रहा है और वहां भी जीवन नारकीय हो चला है। हरियाली गायब हो चुकी है। धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है इसलिए पशु-पक्षियों की कई प्रजातियां लुप्त हो रही हैं। दूर जाने की जरूरत नहीं दिल्ली पर अब ओजोन प्रदूषण का खतरा मंडराने लगा है। इस खतरे की गिरफ्त में राजधानी के आसपास के शहर भी हैं। गर्मी बढऩे के साथ ही ओजोन प्रदूषण में तेजी से बढ़ौतरी होती है जो लोगों की सेहत के लिए खतरनाक है।

पर्यावरण की रक्षा के लिए मृदा, जलवायु और ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम अनिवार्य है। भूसंरक्षण के लिए हमें जैविक खेती को अपनाना होगा। जल सुरक्षा के लिए नदियों को स्वच्छ बनाना होगा, वर्षा के जल का संचय करना होगा। वायु और ध्वनि प्रदूषण के लिए अभी बहुत काम करने होंगे। सारा काम अकेली सरकार नहीं कर सकती। इसमें जन भागीदारी की बहुत जरूरत है। इसके लिए हमें प्रकृति से जुडऩा होगा। पूरे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जिन्होंने अपने दम पर बिना सरकारी मदद के कोई टुकड़ा जंगल का, नदी का, जमीन का अपने सुन्दर कार्यों से बचाकर रखा है। ऐसे कुछ लोगों को आप जानते होंगे, कुछ ऐसे भी हैं जो खामोशी से काम करते हैं। ऐसे लोगों का अनुसरण करने की जरूरत है। अथर्व वेद के पृथ्वी सूक्त में वैदिक राष्ट्रवाद को पूर्ण अभिव्यक्ति मिली है। इसमें कहा गया है कि जिस देश में जो लोग रहते हैं उनके लिए वह देश मातृभूमि के तुल्य वंदनीय है। जिस तरह माता के रक्त-मांस से बच्चे का शरीर बनता है उसी तरह मातृभूमि से उत्पन्न होने वाले अनाज, पानी, हवा और वनस्पतियों से उन देशवासियों का पालन-पोषण होता है तथा पर्यावरण विज्ञान की राष्ट्रीय चेतना भी विकसित होती है। वर्तमान पर्यावरण संकट की चेतावनियों को देखते हुए भारतीय संस्कृति के पर्यावरण संरक्षण संबंधी वैदिक चिंतन को पुन: ताजा करना होगा। वेद हमें प्रकृति के साथ जीने तथा उसके साथ गहरे संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। आइये ब्रह्मांड की पर्यावरण शांति के लिए यज्ञ करें। यह यज्ञ वृक्ष लगाकर भी कर सकते हैं और उनकी रक्षा करके भी। आइये जल, जंगल और जमीन की रक्षा करें।

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