बिना युद्ध के…


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भारत बिना युद्ध के हर वर्ष जवानों को खोता जा रहा है। हर वर्ष सड़क दुर्घटनाओं और आत्महत्याओं के कारण 1600 जवान जीवन खो रहे हैं। यह संख्या देशभर में आतंकवाद निरोधी कार्रवाई में शहीद होने वाले जवानों की संख्या से कहीं अधिक है। सड़क दुर्घटनाओं में जिन्दगी खोना तो इस देश की विडम्बना ही है लेकिन सेना और अर्द्धसैनिक बलों के जवानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती ही जा रही है। जवानों की इस तरह मौत सुरक्षाबलों के लिए बड़ी चिन्ता का विषय है। दुःखद घटनाएं सामने आती रहती हैं कि एक जवान ने अपने चार साथियों की गोली मारकर हत्या कर दी, बाद में उसने खुद को भी गोली मार ली। पिछले कुछ वर्षों से जवानों में असंतोष की घटनाएं भी सामने आईं। कभी समय पर छुट्टी न मिलना भी हत्या या आत्महत्या का कारण बनता है। एक जवान जब ड्यूटी पर तैनात होता है तो उसकी गारंटी नहीं होती कि वह घर कब लौटकर जाएगा। जीवन में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं जब घर वालों को उसकी जरूरत होती है, लेकिन अपनी ड्यूटी के कारण वह अपने परिवार के पास नहीं जा सकता। उसे पत्नी, बच्चों और मां-बाप की चिन्ता सताती रहती है जिसके कारण जवान तनाव में रहने लग जाते हैं।

अधिकतर मामले भूमि से सम्बन्धित होते हैं। कई मामलों में देखा गया कि उनके परिवार रवार के करीबी रिश्तेदार ही या फिर पड़ोसी उनकी जमीन गैर-कानूनी ढंग से हड़प लेते हैं और जवान मजबूरियों के कारण कुछ नहीं कर पाता। वह खुद को असहाय और अकेला महसूस करने लगता है। इसका अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि हमारा नाग​िरक प्रशासन और पुलिस जवानों के प​िरवारों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल हैं। ऐसे में जवान अवसादग्रस्त हो रहे हैं। युद्ध हो या शांतिकाल, साम्प्रदायिक हिंसा हो या प्राकृतिक आपदा, हर वक्त नागरिक प्रशासन को सेना या अर्द्धसैनिक बलों के जवानों की जरूरत पड़ती है और सुरक्षाबलों के जवानों ने हर मोर्चे पर अपने अदम्य शौर्य, साहस और समाज के प्रति समर्पित भावना का परिचय दिया है। भारतीय सशस्त्र सेनाओं की अपनी एक भिन्न कार्य संस्कृति है। यहां सभी के बीच सौहार्द की भावना बनी रहे, इसके लिए संबद्धता और उत्तरदायित्व की समझ विकसित किए जाने का प्रावधान है लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं होता। कई बार देखा गया है कि अधिकारियों और जवानों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ते नहीं बन पाते। सख्त ट्रेनिंग और अनुशासन वाली भारतीय सेना में होने वाली मौतें खतरनाक संकेत देती हैं। जवान जब महसूस करता है कि उसकी जिन्दगी या उसके परिवार रवार को बचाने की चिन्ता तो समाज में दिखाई नहीं देती, तमाम योग्यताओं और कड़ी ड्यूटी देने के बावजूद समाज बदले में इतना भी देने को तैयार नहीं कि जिसके बल पर वह सम्मान से जीवित रह सके तो वह अभाव में जीने की यातना से बचने के लिए आत्महत्या का फैसला कर लेता है।

नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में तैनात जवान नक्सलियों के साथ मानसिक तनाव का भी सामना कर रहे हैं और चिन्ता की बात तो यह है कि ये जवान हालात की दुश्वारियों से इस कदर परेशान हो जाते हैं कि अपना ही अन्त कर लेते हैं। पिछले वर्ष राज्य में 36 जवानों ने आत्महत्या की। संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात जवानों में तनाव का स्तर ज्यादा होता है। इन इलाकों में तो परिवार के साथ बातचीत करना भी मुश्किल होता है। प​िरजनों के परेशानी में होने के कारण जवान छुट्टी लेकर घर जाना चाहते हैं लेकिन छुट्टी नहीं मिल पाती। अर्द्धसैनिक बलों के जवानों की आत्महत्या के कई कारण हैं। अर्द्धसै​न्य बलों के जवानों को वर्षों तक प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने, अपने परिवार से दूर रहने, काम के अधिक घण्टे, नींद की कमी और अवकाश न दिए जाने से तनाव होता है। उचित तनख्वाह आैर सेना की तरह सुविधाओं की मांग को लेकर अर्से से अर्द्धसैन्य बलों के जवान आंतरिक स्तर पर संघर्ष करते रहे हैं। देश में भारी तैनाती के कारण अर्द्धसैनिक बलों की रिजर्व बटालियन तो तीन वर्ष पहले ही खत्म हो चुकी है। ‘जय जवान जय किसान’ का नारा गुंजायमान करने वाले इस देश में जवान भी आत्महत्याएं कर रहे हैं आैर किसान भी।

हालात यह हैं कि सुरक्षाबल हजारों जवानों की कमी से जूझ रहे हैं। जवान भी आम इन्सान हैं, वह भी जीवन की दुश्वारियों से परेशान होते हैं। जवानों में आत्महत्याओं की बढ़ती प्रवृत्ति पर कई बार शोध हो चुके हैं लेकिन इसका समाधान किस तरह हो, इसके लिए भी उपाय किए जाते हैं लेकिन ठोस परिणाम सामने नहीं आया। दरअसल जवानों के काम करने लायक परिस्थितियों को सहज बनाया जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर उन्हें छुट्टी मिले, परिवार के साथ समय बिताने का समय मिले। इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि कोई भी उनके सम्मान को चोट नहीं पहुंचाए। सुरक्षाबलों और समाज में उन्हें भरपूर सम्मान मिले। मुद्दा गम्भीर है इसलिए जवानों के उत्थान के लिए सही दिशा में कदम उठाने जरूरी हैं।

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