कांग्रेस ने विरोध क्यों किया?


सवाल खड़ा हो रहा है कि देश की सबसे प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने ‘जीएसटी’ लागू करने के लिए संसद के ‘केन्द्रीय कक्ष’ में आयोजित समारोह का बहिष्कार क्यों किया? यह हकीकत है कि देश के इस सबसे बड़े ‘कर सुधार’ लाने वाले कानून को बनाने में इस पार्टी के दिग्गज नेताओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही जिनमें वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी तक शामिल थे, मार्च 2011 को संसद में बतौर वित्त मन्त्री उन्होंने इस सन्दर्भ में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था मगर इस पर सहमति नहीं बन सकी थी और इसे लोकसभा की स्थायी समिति को सौंप दिया गया था। गजब यह हुआ कि इस समिति के अध्यक्ष के रूप में भाजपा के नेता यशवन्त सिन्हा ने ऐसे कदम को ‘राष्ट्र विरोधी’ तक कहने में संकोच नहीं किया था। इसके बावजूद देश के लगभग सभी राजनैतिक दलों (अन्नाद्रमुक को छोड़कर) ने इसका सैद्धान्तिक रूप से स्वागत किया और वर्तमान वित्त मन्त्री श्री अरुण जेतली ने इसी छोर को पकड़ कर सफलतापूर्वक पूरे देश में इस पर सर्वसम्मति बनाई।

निश्चित रूप से यह भारत के लोकतन्त्र की ‘जागरूकता और बुद्धिमत्ता’ का शानदार मुजाहिरा था। इससे यह भी साबित हो गया कि 1990 में कुछ लाख डालर की विदेशी मुद्रा के लिए बतौर वित्त मन्त्री देश का सोना गिरवी रखने वाले यशवन्त सिन्हा ने तब विरोधी दल में रहते हुए जीएसटी का विरोध मात्र विरोध के लिए किया था। जीएसटी का सफल होना परोक्ष रूप से कांग्रेस की सफलता भी थी, इसके बावजूद इसने जश्न का विरोध करने का जोखिम ले डाला। इसके नेता तर्क दे रहे हैं कि सरकार की एक कर सुधार नीति को लागू करने के लिए संसद के ऐतिहासिक केन्द्रीय कक्ष में आधी रात को समारोह आयोजित करके मोदी सरकार ने इसकी उस राष्ट्रीय भाव ‘भंगिमा’ का अनादर किया है जिसका सम्बन्ध देश की आजादी के आन्दोलन की महान घटना से जुड़ा हुआ है। 14 अगस्त 1947 को आधी रात को स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री के रूप में स्व. पं. जवाहर लाल नेहरू ने तब संविधान सभा से परिवर्तित लोकसभा व पहले से जारी राज्यसभा के सदस्यों का संयुक्त सत्र बुलाकर भारत की आजादी की घोषणा की थी।

वह क्षण भारत के आने वाले किसी भी इतिहास की ‘अपरिवर्तनीय’ घटना थी जिसकी तुलना किसी नई सरकारी नीति के लागू होने से नहीं की जा सकती है, बिना शक तर्क में वजन है मगर इसके साथ यह भी तर्क है कि जीएसटी पूरे भारत के ‘आर्थिक एकीकरण’ का वैसा ही कदम है जैसा कि आजादी के बाद 536 देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय करने का स्व. सरदार बल्लभ भाई पटेल का प्रयास, यही वजह रही कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताया मगर इसके विरोध में कुछ विद्वान तर्क दे रहे हैं कि जीएसटी नया विचार नहीं है, इसकी शुरूआत स्व. राजीव गांधी के शासन के दौरान तत्कलीन वित्त मन्त्री वी.पी. सिंह ने भारत के कर ढांचे में मूल्य वृद्धि कर, वैट को लागू करके कर दी थी और यह उससे आगे का ही तार्किक चरण है मगर यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इसे लागू करने के लिए राज्यों के संघ (यूनियन आफ इंडिया) को अपनी वैविध्यपूर्ण लोकतान्त्रिक परिस्थितियों में एकमेव ताकत दिखानी थी। इसी वजह से राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने इसे लोकतन्त्र की ‘सूझबूझ’ बताया है। इस एकमेव शक्ति प्रदर्शन का सम्मान कांग्रेस पार्टी को क्यों नहीं करना चाहिए था। इसके साथ यह भी दुरुस्त है कि लोकतन्त्र में विरोध भी इसकी शक्ति होता है और कांग्रेस पार्टी को जश्न मनाने के तरीके पर विरोध करने का पूरा अधिकार है।

जाहिर है कि इसके राजनैतिक जोखिम का अन्दाजा लगाकर ही इस पार्टी ने यह फैसला किया होगा लेकिन यह भी सच है कि नेहरू और इन्दिरा गांधी के ‘समाजवादी आर्थिक रास्ते’ को अलविदा कहने की शुरूआत भी खुद कांग्रेस पार्टी ने ही डा. मनमोहन सिंह की रहनुमाई में की थी, 1991 में लालकिले से जब पहली बार तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. पी.वी. नरसिम्हा राव ने ‘विदेशी निवेश’ शब्द का उच्चारण करते हुए आह्वान किया था कि देश की आर्थिक स्थिति को सही करने के लिए और विदेशी मुद्रा (डालरों) की जरूरत को पूरा करने के लिए इस निवेश की सख्त जरूरत है तो इसी भारत के आम लोगों ने समझा था कि अब भारत में विदेशी कम्पनियां डालरों की ‘दुकानें’ खोलेंगी मगर जब नरसिम्हा राव के जमाने में बतौर वित्त मन्त्री डा. मनमोहन ङ्क्षसह ने रुपये का ‘अवमूल्यन’ किया तो लोगों की समझ में आया कि डालर लाने की कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी।

इससे पहले जब 1966 में स्व. इदिरा गांधी ने 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद पहली बार रुपये का अवमूल्यन किया था तो भारत की आर्थिक व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था और बड़े कार्पोरेट घरानों को ही इसकी कीमत चुकानी पड़ी थी, परन्तु 1991 में भारत एक नई शुरूआत कर रहा था और इसके मूल में इससे पहले 1990 में भारत के ‘सोना गिरवी रखने’ का वह वाकया था जिसने आम हिन्दोस्तानी को भीतर से हिला कर रख दिया था लेकिन 2017 में भारत ऐसी ‘सीढ़ी’ पर चढ़ चुका है जिसकी अन्तिम ‘पैड़ी’ दुनिया को मुठी में भरने के मुकाम पर जाकर खुलती है। इसका जश्न मनाया जाना गलत तो नहीं कहा जा सकता और जिस संसद के रास्ते यह सीढ़ी तैयार हुई है उसी के भीतर जश्न मनाने पर आपत्ति क्यों हो, बेशक इसे लेकर देश की सड़कों का आलम फिलहाल अफरा-तफरी का है मगर इसे ठीक भी तो सरकार ही करेगी।

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