फिल्मों को लेकर दोहरे मापदंड क्यों ?


केरल हाईकोर्ट ने ‘एस दुर्गा’ फिल्म के निर्देशक सनत कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए गोवा में चल रहे फिल्म महोत्सव में स्क्रीनिंग की मंजूरी दे दी है। हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दे दिया है कि सीवीएफसी द्वारा सर्टिफिकेट दिए जाने के बाद का संस्करण प्रदर्शित किया जाए। केरल हाईकोर्ट का फैसला लोकतंत्र की जीत है। फिल्म उद्योग ने भी इसे बड़ी जीत माना है। इस फिल्म के प्रदर्शन का फैसला फिल्मोत्सव के लिए गठित 13 सदस्यीय ज्यूरी ने किया था लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ज्यूरी को विश्वास में लिए बिना फिल्म ‘एस दुर्गा’ आैर मराठी फिल्म ‘न्यूड’ को महोत्सव से हटा दिया था।

मंत्रालय के इस फैसले के विरोध में ज्यूरी अध्यक्ष सुजॉय घोष, सदस्य अपूर्व असरानी और ज्ञान कोरिया ने इस्तीफा दे दिया था। बात आई-गई हो जाती लेकिन हुई नहीं, तूल पकड़ती गई। फिल्म ‘एस दुर्गा’ के निर्देशक सनत कुमार इस अन्याय के खिलाफ केरल हाईकोर्ट चले गए। कोर्ट ने अपने निर्णय के दौरान जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही, वो ये कि ‘‘जब केन्द्रीय प्रमाणन बोर्ड ने इस फिल्म को यू/ए सर्टिफिकेट दे दिया आैर उसके बाद फिल्म में कोई बदलाव भी नहीं किए गए आैर चूंकि आईएफएफआई ज्यूरी का निर्णय अन्तिम और बाध्यकारी था तो फिर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास इस निर्णय को बदलने की कोई शक्ति नहीं थी।’’ कोर्ट का यह निर्णय फिल्म के निर्देशक के साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जीत है।

कोर्ट के फैसले से पूर्व फिल्मोत्सव ज्यूरी के 13 सदस्यों में से 6 सदस्यों ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर दोनों फिल्मों को फिल्मोत्सव के बाहर करने पर चिन्ता जताई थी। पत्र में इन दोनों फिल्मों का बचाव करते हुए कहा गया था कि ये फिल्में सैक्स और महिला सशक्तिकरण पर होने वाली चर्चाओं की दिशा में हमारा अहम कदम है आैर उनके हिसाब से काफी महत्वपूर्ण भी है। दूसरी तरफ सूचना प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि फिल्म समारोह में फिल्म दिखाए जाने के बारे में सरकार के नियम साफ करते हैं कि असाधारण परिस्थितियों में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास अधिकार है कि वह किसी भी ऐसी फिल्म को दिखाए जाने पर रोक लगा सके जिससे देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता हो या फिल्म से कानून व्यवस्था या पड़ोसी देशों के सम्बन्ध पर असर पड़ता हो।

मंत्रालय का मानना है कि दुर्गा हिन्दुओं की एक प्रमुख देवी का नाम है आैर फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति दी जाती है तो इससे लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है वहीं कानून व्यवस्था को लेकर समस्या पैदा हो सकती है। आज देश में जिस तरह का वातावरण है, ऐसी स्थिति में मंत्रालय की आशंका निर्मूल नहीं है। इस फिल्म को मुम्बई फिल्म महोत्सव में दिखाए जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। तब भी मंत्रालय ने ​इस फिल्म को दिखाए जाने के बारे में मुम्बई एकेडमी ऑफ फिल्म इमेज के अनुरोध को ठुकरा दिया था। न्यूड फिल्म के बारे में मंत्रालय का तर्क था कि यह फिल्म तकनीकी तौर पर पूरी नहीं है। दूसरी ओर फिल्म के निर्माता-निर्देशक का कहना है कि भारत में दुर्गा नाम बड़ा ही सामान्य है। यह केवल देवी का नाम नहीं, यहां हजारों महिलाओं का नाम दुर्गा है लेकिन उनके साथ इन्सानों जैसा व्यवहार नहीं किया जाता। जब उन्हें मदद की जरूरत होती है तब लोग उन्हें नकार देते हैं लेकिन जब एक फिल्म का शीर्षक इस नाम से आता है तो लोग चिल्लाने लगते हैं कि इससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं।

अहम सवाल यह भी है कि क्या किसी फिल्म का नाम और विषय-वस्तु उस पर बैन लगाए जाने का कारण बननी चाहिएं। कई बार दलीलें सुनकर विश्वास नहीं होता कि क्या हम उस समाज का हिस्सा हैं, जिसमें रूढ़ियों को तोड़ने का सिलसिला सदियों पुराना है। जिस समाज में दकियानूसी परम्पराओं को तोड़कर आजाद वातावरण तैयार करने वाले व्यक्तित्व हुए हैं, उसमें कला और अभिव्यक्ति को लेकर ऐसी तंग सोच होना क्या जायज है? समाज में कलाओं पर पहरा बैठाने की कोशिशें नहीं होनी चाहिएं लेकिन फिर भी ऐसा किया जाता है। सरकारों को लगता है कि कुछ फिल्में कई वर्जनाओं को तोड़ती हैं। वर्जनाओं के नाम पर फायर और वाटर नाम की फिल्म के साथ क्या हुआ था, इसका दंश आज भी सिनेमा की विरासत में जिन्दा है। वाटर फिल्म की शूटिंग तक नहीं होने दी। विरोध शांत हुआ तो फिल्म की शूटिंग श्रीलंका में की गई। बैंडिट क्वीन के साथ भी यही कुछ हुआ था।

फिल्म की कहानी फूलन देवी की जिन्दगी पर आधारित थी। एक दलित युवती की मान-मर्यादा आैर इज्जत कुचली जाती है, वो जिन्दा रहकर अपने ऊपर हुए अत्याचार का बदला लेती है। यह तो हकीकत है लेकिन उसके रेप सीन में न्यूडिटी को लेकर हाय-तौबा मचाई गई थी और फिल्म को बैन करने की मांग उठी थी। हमारा समाज आधुनिकता और उदारवाद की नई रोशनी में आंखें खोल रहा था तब भी फिल्मों पर सियासत होती रही और आज भी। हैरानी होती है कि फूहड़ आइटम सांग आैर अश्लील डांस पर किसी को ​दिक्कत नहीं होती लेकिन गं​भीर विषयों पर न्य​ूडिटी के नाम पर आपत्ति हो जाती है। फिल्मों को लेकर दोहरे मापदंड अपनाए जाते हैं। अहम सवाल यह भी है कि क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय केरल हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करेगा? मंत्रालय को कोई भी फैसला लेने से पहले ज्यूरी के सदस्यों को विश्वास में लेना चाहिए था, अगर वह ऐसा करता तो शायद लफड़ा होता ही नहीं।

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