9 अगस्त 1942 से लेकर 9 अगस्त 2017 तक का


भारत छोड़ो आन्दोलन 9 अगस्त, 1942 ई. को सम्पूर्ण भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर प्रारम्भ हुआ था। भारत की आजादी से सम्बंधित इतिहास में दो पड़ाव सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण नजर आते हैं। प्रथम 1857 ई. का स्वतंत्रता संग्राम और द्वितीय 1942 ई. का भारत छोड़ो आन्दोलन। भारत को जल्द ही आजादी दिलाने के लिए महात्मा गांधी द्वारा अंग्रेज शासन के विरुद्ध यह एक बड़ा नागरिक अवज्ञा आन्दोलन था। क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद गांधी जी ने एक और बड़ा आन्दोलन प्रारम्भ करने का निश्चय ले लिया। इस आन्दोलन को भारत छोड़ो आन्दोलन का नाम दिया गया।

अंग्रेजों भारत छोड़ो
भारत छोड़ो आन्दोलन या अगस्त क्रान्ति भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की अन्तिम महान लड़ाई थी, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया। क्रिप्स मिशन के खाली हाथ भारत से वापस जाने पर भारतीयों को अपने छले जाने का अहसास हुआ। दूसरी ओर दूसरे विश्वयुद्ध के कारण परिस्थितियां अत्यधिक गम्भीर होती जा रही थीं। जापान सफलतापूर्वक सिंगापुर, मलाया और बर्मा पर कब्जा कर भारत की ओर बढऩे लगा। दूसरी ओर युद्ध के कारण तमाम वस्तुओं के दाम बेतहाशा बढ़ रहे थे, जिससे अंग्रेज सत्ता के खिलाफ भारतीय जनमानस में असन्तोष व्याप्त होने लगा था। जापान के बढ़ते हुए प्रभुत्व को देखकर 5 जुलाई, 1942 ई. को गांधी जी ने हरिजन में लिखा अंगे्रजों! भारत को जापान के लिए मत छोड़ो बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।

क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव खारिज
इस समय द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ चुका था, और इसमें ब्रिटिश फौजों की दक्षिण-पूर्व एशिया में हार होने लगी थी। एक समय यह भी निश्चित माना जाने लगा कि जापान भारत पर हमला कर ही देगा। मित्र देश, अमेरिका, रूस व चीन ब्रिटेन पर लगातार दबाव डाल रहे थे, कि इस संकट की घड़ी में वह भारतीयों का समर्थन प्राप्त करने के लिए पहल करें। अपने इसी उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए उन्होंने स्टेफोर्ड क्रिप्स को मार्च, 1942 ई. में भारत भेजा। ब्रिटेन सरकार भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देना नहीं चाहती थी। वह भारत की सुरक्षा अपने हाथों में ही रखना चाहती थी और साथ ही गवर्नर जनरल के वीटो अधिकारों को भी पहले जैसा ही रखने के पक्ष में थी। भारतीय प्रतिनिधियों ने क्रिप्स मिशन के सारे प्रस्तावों को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया।

बापू का आह्वान करो या मरो
कांग्रेस के इस ऐतिहासिक सम्मेलन में महात्मा गांधी ने लगभग 70 मिनट तक भाषण दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मैं आपको एक मंत्र देता हूं करो या मरो जिसका अर्थ था। भारत की जनता देश की आजादी के लिए हर ढंग का प्रयत्न करें। गांधी जी के बारे में भोगराजू पट्टाभि सीतारामैया ने लिखा है कि वास्तव में गांधी जी उस दिन अवतार और पैगम्बर की प्रेरक शक्ति से प्रेरित होकर भाषण दे रहे थे। वह लोग जो कुर्बानी देना नहीं जानते, वे आज़ादी प्राप्त नहीं कर सकते। बापू ने कहा था कि एक देश तब तक आजाद नहीं हो सकता जब तक उसके लोग एक-दूसरे पर भरोसा न करते हों। भारत छोड़ो आन्दोलन का मूल भी इसी भावना से प्रेरित था। देश के कोने-कोने में करो या मरो की आवाज़ गुंजायमान हो उठी, और चारों ओर बस यही नारा श्रमण होने लगा।

 

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