क्या आप जानते है सांप सीढ़ी की शुरुआत किसने और कब की , जानिए इस खेल जुड़ी खास बातें !


आज हम आपको बताने जा रहे है सांप-सीढ़ी खेल के बारे , वैसे तो अपने बचपन मैं सांप-सीढ़ी गेम खेला ही होगा पर क्या आप जानते है ये खेल सबसे पहले कहा खेला था और किसने इसे बनाया था। जी हाँ , आज हम आपको इसके इतिहास के बारे में बताने जा रहा है ।

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वैसे बचपन में हम सभी ने सांप-सीढ़ी ज़रूर खेला है । निजी तौर पर ये हमें लूडो से कहीं ज्यादा आसान खेल लगता था क्योंकि इसमें बिल्कुल भी दिमाग नहीं लगाना पड़ता है बस सब कुछ आपके पासे को पटकने के हुनर और किस्मत पर निर्भर होता है। लेकिन फिर भी यह खेल लोगों को बहुत पसंद आता है। खासकर बच्चे तो इस खेल के दीवाने ही होते हैं ।

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इस खेल से जुड़ी एक अनोखी बात ये भी है कि अधिकतर लोग यही मानते हैं कि यह खेल विदेशों से आया है पर क्या आपको पता है कि यह खेल विदेशों की नहीं बल्कि हिंदुस्तान की ही उपज है और जिस प्रकार का रूप आप इन खेलों का आज देखते हैं वो इसका बदला हुआ रूप है । असल इसका रुप कुछ और ही था ।

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आपको बता दे कि प्राचीन भारत में इस खेल को मोक्षपट या मोक्ष पटामु के नाम से जाना जाता था । इसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से खेला जाता रहा है वहीं कुछ लोगों का मानना है कि स्वामी ज्ञानदेव ने इस खेल को 13वीं शताब्दी में बनाया था । इस खेल को बनाने का मुख्य उद्देश्य बच्चों को कर्म और काम की शिक्षा देना था ।

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बता दे सांप-सीढ़ी के खेल में सीढ़ियां अच्छे कर्म को दर्शाती थीं वहीं सांप हमारे बुरे कर्म को दर्शाते थे। हमारे अच्छे कर्म हमें 100 के नजदीक लेकर जाते हैं जिसका अर्थ था मोक्ष।

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वहीं बुरे कर्म हमें कीड़े-मकौड़े के रूप में दुबारा जन्म लेने पर मजबूर करते हैं। पुराने खेल में सांपों की संख्या सीढ़ियों से अधिक होती थी। इससे ये दर्शाया गया था कि अच्छाई का रास्ता बुरे रास्ते से काफ़ी कठिन है ।

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आपको ये भी बता दे कि इस गेम को नया रूप किसने दिया और कहा दिया था । ये खेल 19वीं शताब्दी में इंग्लैंड पहुंचा माना जाता है कि इसे शायद इंग्लैंड के शासक अपने साथ ले गए थे। 1943 में ये खेल USA पहुंचा और वहां इसे मिल्टन ब्रेडले ने एक नया रूप दिया। अब ये खेल थोड़ा आसान हो गया है क्योंकि इसमें सांप और सीढ़ियों की संख्या सामान है। और अब यह कोई मैसेज नहीं देता है।