क्या आप जानते है वकील सिर्फ ‘काला कोट’ ही क्यों पहनते है ?


वकील शब्द की बात आते ही आपको कोर्ट-कचहरी जैसी जगहों का ध्यान आने लगता है, या कुछ फ़िल्मी डायलॉग याद आने लगेंगे ‘तारीख पे तारिख’ जैसे। वकील एक ऐसा चरित्र है जो इन्साफ दिलाने के लिए न्यायालय में आपका पक्ष पेश करता है और आपके हक़ के लिए कानूनी लड़ाई लड़ता है। काला कोट वकील की पहचान होती है पर आपने कभी ये सोचा है की वकील सिर्फ काला कोट ही क्यों पहनते है ? ये काला कोट पहनने की प्रथा किसने शुरू की होगी ? इस तरह के कई सवाल है तो आएये पता लगाते है इस विषय से जुडु कुछ अहम बाते के बारे में।

माना जाता है वकालत की शुरुआत वर्ष  1327 में हुई थी उससे पहले व्यक्ति इन्साफ के लिए सभा में खुद अपना पक्ष रखता था और अपने लिए कानूनी लड़ाई उसे खुद ही लड़नी होती थी।

इतिहास के अनुसार एडवर्ड तृतीय ने वकालत का आरम्भ किया था और साथ ही उन्होंने वकीलों के लिए एक ख़ास पहनावा भी निर्धारित किया। पर उस वक्त ये काला कोट नहीं था बल्कि वकीलों के लिए सुनहरे लाल रंग के कपड़े और उस पर भूरे रंग का गाउन हुआ करता था।
शुरुआत में वकीलों को चार श्रेणियों में बांटा गया स्टूडेंट, प्लीडर, बेंचर तथा बैरिस्टर।

ये सिलसिला वर्ष 1600 तक चलता रहा और फिर वकीलों की पौशाक पर दुबारा विचार किया गया। माना गया की बार काउंसिल को जनता से सम्बंधित ड्रेस ही पहननी चाहिए और उस वक्त इस काले कोट का निर्धारण वकीलों की नयी पौशाक के रूप में किया गया। ऐसा माना जाता था कि यह लम्बा काला गाउन उनके पेशे की पहचान है और उन्हें बाकी लोगों से अलग करता है।

वर्ष 1961 में वकीलों की पोशाक को लेकर एक अधिनियम जारी किया गया जिसके अनुसार अदालत में वकीलों को सफ़ेद शर्ट पर सफ़ेद बैंड टाई और काला कोट पहनकर आना अनिवार्य कर दिया गया। ये भी माना जाता है की काला कोट प्राधिकरण और शक्ति का प्रतीक है। साथ ही जो सफ़ेद बंद टाई वकील पहनते है उसे निरपराधता और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है।

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