भारत का यह बेटा नहीं होता तो आज भी कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा होता


जैसा की आप और हम सब जानते ही है कि जब से भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन हुआ है। तब से ही कश्मीर एक विवादित मामला रहा है। आज कश्मीर जिस परेशानी से गुजर रहा है। इसके लिए बहुत से लोग जिम्मेदार है। यदि हम आज कश्मीर का इतिहास पडऩे बैठते है तो हमें सब कुछ ही बहुत अच्छा लगेगा और यह जितना देखने में असान है उतना ही जब इसे देखो तो यह मुश्किल है। यदि आज कश्मीर भारत का एक अभिन्न हिस्सा है तो इसका सारा का सारा श्रेया सिर्फ एक ही व्यक्ति को जाता है। जिसने आपनी जान को जोखिम में डालकर कश्मीर को पाकिस्तान में जाने से रोका आज हम आपको उस महान ऐसे व्यक्ति के बारे में बताने जा रहे हैं। जिसका जिक्र इतिहास में तो जरूर होता ही है लेकिन उनकी इस वीरता से बहुत ही कम लोग रूबरू है।  तो आइए चालिए आपको बताते है कि वह महान इंसान कोई और नहीं बाल्कि ब्रगेडियर राजेंद्र सिंह कश्मीर रियासत के सेना अध्यक्ष थे।

राजा हरि सिंह ने इंकार किया भारत सरकार की बात मानने को

जब भारत को आजादी मिली थी तो वह 565 छोटी बड़ी रियासतों में बटां हुआ था। इन सभी रियासतों की अपनी ही फौजा और अपना ही कानून हुआ करता था। इन रियासतों की अपनी फौज अपना कानून था। 15 अगस्त 1947 आते आते कुछ रियासतें भारत में सम्मिलित हो गई परंतु कुछ रियासतों ने भारत में सम्मिलित होने से मना कर दिया इन्हीं में से एक रियासत थी कश्मीर की जिस के राजा हरिसिंह थे हरि सिंह कश्मीर को आजाद रखना चाहते थे भारत ने कई बार हरि सिंह को समझाया और उनसे गुजारिश की परंतु हरि सिंह नहीं माने क्योंकि भारत सरकार को पाकिस्तान की हरकतों का अंदेशा था।

कश्मीर की आधी आबादी मुस्लिम थी और उन सब पर अपना हक जामाने वाले अल्पसंख्यक हिंदू थे। पाकिस्तान यह चाहता था कि इसका फायदा उठाना वह मुस्लिम बहुल एरिया को पाकिस्तान में सम्मिलित करना चाहता था। वह जानता था कि उसके लिए यह सब बहुत कठिन नहीं है। क्योंकि कश्मीर में भी दिन पर दिन बहुसंख्यक मुस्लिम विद्रोही होते जा रहे थे। हरिसिंह को उस समय भी समझाने की बहुत सी कोशिशे की लेकिन वह अपने ही पक्ष में थे।

उन्हें खतरे का बिल्कुल मालूम ही नहीं था भारत सरकार का अंदेशा सच साबित हुआ 22 अक्टूबर 1947 हथियारों से लैस कबायली पाकिस्तान से श्रीनगर की ओर रवाना हो गए और दूसरी तरफ कश्मीर के अंदर भी बगावत शुरू हो गई।

पाकिस्तान कश्मीर में पूरी तरह धूल मिल गए और वह पूरी तरह से सफल हो गए। उन्होंने फिर बहुसंख्यक मुस्लिमों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश की और उसका परिणाम बाद में यह निकला की कश्मीर की मुस्लिम सेना ने भी कश्मीरियों का साथ छोड़ दिया और पाक में कबायली से हाथ मिला लिया । उसके बाद से ही पाकिस्तानी कबायली मुजफ्फराबाद पहुंच गए उसके बाद वह श्रीनगर से 160 किलोमीटर की दूरी पर थे लेकिन यह दूरी भी कम थी।

जब जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान का कब्जा हुआ तो महाराजा हरि सिंह को भारतीय सेना की जरूरत पड़ी थी । तब भारत सरकार का यह कहना था कि जब तक राजा  इंस्ट्रूमेंट ऑफ एसेशन पर हस्ताक्षर नहीं कर देते तब तक भारत सरकार कोई कदम नहीं उठाएगी इधर स्थिति बहुत ही गंभीर होती जा रही थी जिसके लिए तुरंत निर्णय लेनी की आवश्यकता थी।

खून के आंसू पाकिस्तानी कबाइलियों ने रोए 

पाकिस्तानी कबाइलियों की संख्या तकरीबन 6000 के ऊपर थी। वह कई जगहों पर कब्जे कर चुकी थी । वह श्रीनगर को भी अपना शिकार बनाने की सोच रही थी लेकिन उनको इस चीज का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि वह आगे चलकर खूद खून के आंसू रोने वाले हैं। क्योंकि उनके सामने ढाल बनकर खड़े थे ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह जमवाल ने जो किया उसका परिणाम यह था कि आज कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। उन्हें जब इस बात की खबर हुई कि पाकिस्तानी कबायली श्रीनगर से बहुत दूर नहीं है तो उन्होंने पहले से ही बारामुला और श्रीनगर से जोडऩे वाले पुल का ही खत्म कर डाला। जिसके कारण 2दिन तक हमलावर श्रीनगर में दो दिन तक नहीं घुस पाए। भारत की सेना को आने में थोड़ा सा समय लगता इसलिए राजेंद्र सिंह ने खुद ही हमलावरों का करारा जवाब दिया और हमलावरों को रोकने के लिए वह अखिकार कामयाब रहे । लेकिन जब तक उन्होंने वह वीरगति को हासिल किया और जैसे ही वहां भारतीय सेना पहुंची तब तक हमलावरों ने उन्हें वहां रोंद दिया। हमें ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह जमवाल पर गर्व है उनको मरणोपरांत पहले महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

Choose A Format
Poll
Voting to make decisions or determine opinions
Story
Formatted Text with Embeds and Visuals
List
The Classic Internet Listicles
Video
Youtube, Vimeo or Vine Embeds
Thanks for loving our story. Like our Facebook page to get more stories.