20 साल सब्जी बेचकर गरीबों के लिए बनवाया अस्पताल, ये जज़्बा मिसाल है


कहते है मेहनत और सच्ची लगन से कोई काम किया जाए तो वो जरूर सफल होता है , और जब काम अच्छाई के लिए हो तो भगवान् भी इस काम में साथ देते है। आप इस प्रेरणादायक कहानी को सुनकर आश्चर्यचकित तो होंगे ही साथ ही आप भावुक भी हो जायेंगे। यह कहानी है कोलकता के पास एक छोटे से गाँव में रहने वाली 74 वर्षीय सुभाषिनी मिस्त्री की जिन्होंने आज देश के सामने ऐसी मिसाल रखी है की हर कोई उन्हें सम्मान को श्रद्धा के साथ नमन कर रहा है। इस बुजुर्ग महिला ने कई मुसीबतों से लड़ते हुए, कई तरह के संघषों का सामना करते हुए यह कमाल कर दिखाया है। जी हाँ इन्होने अपनी तमाम उम्र सब्ज़ी बेचीं और आज अपनी मेहनत के दम गरीब लोगों के लिए अस्पताल बनवा दिया।

सुभाषिनी मिस्त्री का जन्म वर्ष 1943 में हुआ। उस वक्त भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान बंगाल में भीषण अकाल पड़ा। उनका परिवार बेहद गरीब था साथ ही परिवार में 14 बच्चे थे। इनके पिता के पास थोड़ी बहुत जमीन थी जिसपर वो खेती करते थे पर परिवार का भरण पोषण नहीं हो पता था। कुछ ही सालों में 14 भाई-बहनों में से 7 की मौत हो गयी।

12 साल की उम्र में सुभाषिनी की शादी हो गयी जिससे उनके चार बच्चे हुए। उनके पति खेतिहर मजदूर थे। इसी बीच पति की एक दिन तबियत बिगड़ी , पैसों की कमी और डॉक्टरों की लापरवाही से सुभाषिनी ने अपना खो दिया। गरीब और अनपढ़ सुभाषिनी पर अपने चार बच्चों को पालने का भार आ गया पर साथ ही उन्होंने एक संकल्प लिया की जो दर्द उन्होंने झेला है वो किसी और को नहीं झेलना पड़ेगा।

वो अपने गाँव में खुद एक अस्पताल बनवाएंगी। बच्चों को पालने के लिए उन्होंने खाना बनाना, बर्तन-कपड़े धोना, झाड़ू-पोछा करने से लेकर मजदूरी तक सारे काम किए। धीरे-धीरे खुद ही सब्ज़ी ऊगा कर बेचने का काम किया जो सफल होने लगा। लगभग बीस सालों तक एक -एक पाई जोड़कर 1992 में सुभाषिनी ने हंसपुकुर गांव में लौटकर 10,000 रुपये में यहाँ एक एकड़ जमीन खरीदी।

एक अस्थाई शेड से शुरुआत की गयी और लाउडस्पीकर की मदद से शहर में डॉक्टर्स से फ्री सेवा की विनती की गई। हाथ के साथ हाथ जुड़ते गए और कारवां चल निकला। पहले ही दिन इस अस्पताल में 252 मरीजों का इलाज हुआ। बारिश के दिनों में हालात बुरे हुए तो स्थानीय सांसद की मदद और बहुत कोशिशों के बाद अस्पताल को सीमेंट की छत मिल गई।

आज Humanity Hospital के पास 3 एकड़ की जमीन है। यह हॉस्पिटल 9,000 स्क्वायर फीट में बना हुआ है। अब तो यह दो मंजिला हो चुका है। यहाँ गरीबों को फ्री में इलाज मिलता है। गरीबी रेखा के ऊपर के लोगों से 10 रुपए की फीस ली जाती है। लेकिन आज सुभाषिनी मिस्त्री कहती है जिस दिन यह अस्पताल सर्व-सुविधा संपन्न हो जाएगा। 24 घंटे अपनी सेवाएं दे पाएगा। तब मैं चैन से मर पाऊंगी।’ किसी ने सच ही कहा है अगर सच्चे मन और खुद पर विश्वास के साथ सफर तय किया जाए तो मंजिल जरूर मिलती है।