रेलवे स्टेशन बना हर महीने 600 बच्चों का घर


वैसा तो हमने रेलवे स्टेशनों पर अक्सर गरीब बच्चों को खाते, सोते, और रहते देखा है पर कभी उन्हें रेलवे स्टेशन को अपना घर समझकर रहते नहीं देखा। दोस्तों आज हम आपको ऐसी ही एक घटना बताने जा रहे है जिसमें हर महीने 600 बच्चे रेलवे स्टेशन को अपना घर बना लेते है। जी हां, राहुल मिश्रा नाम का एक बच्चा जिसको रेलवे स्टेशन हमेशा से आकर्षित करते थे लेकिन ऐसे ही किसी स्टेशन का प्लेटफार्म एक दिन उसका घर बन जाएगा, यह उसने कभी नहीं सोचा था।

10 वर्षीय राहुल अपने पिता की मार से तंग आकर 6 हफ्ते पहले घर से भाग आया था और आकर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रहने लगा. अब उसने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को अपना घर बना लिया है। राहुल ने बताया कि “मेरे पिता अक्सर हर दिन मुझे और मेरी मां को पीटते थे। यहां तक कि मेरी मां को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था।” उसकी मां को डर था कि उसका पिता मार डालने तक उसकी पिटाई करेगा तो एक दिन उसकी मां ने राहुल को 200 रूपये दिए और उसे घर छोड़ने और कभी वापस नहीं आने के लिए कहा। वह बिहार शरीफ स्टेशन पर रुकने वाली ट्रेन में सवार हो गया जिसका अंतिम गंतव्य स्टेशन नई दिल्ली था।

राहुल नई दिल्ली स्टेशन पर उतरा और वहां रहने लगा जब तक कि स्टेशन पर कूड़ेदान में खाना ढूंढते राहुल पर सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर नहीं पड़ी। नालंदा में पचौरी गांव का रहने वाला यह लड़का उन 600 “रेलवे बच्चों” में से एक है जो हर महीने नई दिल्ली स्टेशन पर आने वाली ट्रेन से उतरते हैं और प्लेटफार्म को ही अपना घर बना लेते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) ने दिल्ली के “रेलवे बच्चे” नाम दिया है। इनमें देश के सभी हिस्सों से आने वाले ज्यादा बच्चे गरीब और प्रताड़ना के चलते भाग कर आए हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें बड़े शहर की चकाचौंध यहां खींच लाई है। इनमें से कई बच्चों के लिए रेलवे प्लेटफार्म पहला ठहराव और आश्रय है।

आरपीएफ और एनजीओ ने इन भागे हुए बच्चों के लिए नई दिल्ली स्टेशन पर एक शिविर बनाया है और यह सुनिश्चित किया है कि इनकी तस्करी ना की जाए। ज्यादातर भागे हुए बच्चों में लड़के हैं। रेलवे स्टेशन पर मिली कुछ लड़कियों को सरकारी आश्रय स्थलों पर भेज दिया गया है। चार एनजीओ साथी, सलाम बालक ट्रस्ट, प्रभास और सुभाक्षिखा नए बच्चों की तलाश में प्लेटफार्म को खंगालते हैं। नई दिल्ली स्टेशन पर आरपीएफ के एक अधिकारी प्रताप सिंह ने बताया कि हर दिन करीब 15-20 बच्चे यहां स्टेशन पर आते हैं जिनमें से ज्यादातर उत्तर प्रदेश और बिहार के होते हैं।

एक बार जब ऐसे बच्चे का पता चलता है तो आरपीएफ कर्मी उनकी निजी जानकारियां लिखते हैं और उन्हें काउंसिलिंग के लिए बाल देखभाल संस्थानों में भेज दिया जाता है। अगर वे लौटने की इच्छा नहीं जताते तो उन्हें सरकारी आश्रय स्थलों पर ले जाया जाता है। गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2011 से 2014 के बीच 3.25 लाख बच्चे लापता हो गए थे। हर साल एक लाख बच्चे लापता होते हैं और उनमें से करीब आधे बच्चे कभी नहीं मिलते। साथी द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, हर साल 80,000 और 100,000 बच्चे रेलवे स्टेशन पहुंचते हैं और कई बच्चे अपने परिवारों से मिले हैं।

गरीबी के कारण 12 साल की उम्र में घर से भागा रोहित सिंह ऐसा ही बच्चा है जिसे उसके परिवार से मिलाया गया। लेकिन हर बच्चा इतना खुशकिस्मत नहीं होता। कुछ बच्चों का शोषण किया जाता है, तस्करी की जाती है और कई बच्चों को नशे की लत लग जाती है। 15 वर्षीय रूपक इनमें से एक है। साथी के एडवोकेसी अधिकारी रोहित शेट्टी ने कहा कि बच्चों के लिए हेल्पाइन चाइल्डलाइन की हालत खराब है। रेलवे में बच्चों के लिए एक समर्पित हेल्पलाइन की जरूरत है। राहुल घर नहीं जाना चाहता है और उसे सरकारी आश्रय स्थल भेजा जा सकता है। तब तक के लिए प्लेटफॉर्म उसका घर रहेगा।

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