किस शास्त्र के अनुसार हिन्दू रखते हैं चोटी, जानिए इसका वैज्ञानिक कारण


हिन्दू धर्म में प्राचीनकाल से ही पांच संप्रदायों का प्रचलन रहा है:- शैव, वैष्णव, शक्त, वैदिक और स्मार्त। सभी संप्रदाय के अलग-अलग नियम और संस्कार होते हैं लेकिन सभी में दो तरह के विभाजन भी होते हैं, जैसे एक वह समूह जिसे समाज में संस्कार, कर्मकांड, यज्ञ, मंदिर आदि के कार्यों को सुचारू रूप से संपन्न करने या कराने की जिम्मेदारी सौंप रखी है। दूसरा वह समूह जिसे साधु समाज कहते हैं जो समाज को धर्म का मार्ग बताता है, आश्रम में रहकर शिक्षा और दीक्षा देता है और जो धर्म की रक्षार्थ शस्त्र और शास्त्र दोनों में पारंगत होता है। उक्त पांचों संप्रदाय में यह दो तरह के विभाजन होते हैं।

चोटी रखने के कारण-

 बच्चे का जब पहले साल के अंत, तीसरे साल या पांचवें साल में जब मुंडन किया जाता है तो सिर में थोड़ी बाल रख दिए जाते है जिसे चोटी कहते हैं। इस कार्य को मुंडन संस्कार कहते हैं। सिर पर शिखा या चोटी रखने का संस्कार यज्ञोपवित या उपनयन संस्कार में भी किया जाता है। सिर के जिस स्थान पर चोटी रखी जाती है उसे सहस्त्रार चक्र कहते हैं। माना जाता है कि इस चर्क के नीचे ही मनुष्य की आत्मा निवास करती है। विज्ञान के अनुसार, यह स्थान मंस्तिस्क केंद्र होता है। यहां से ही बुद्धि, मन, और शरीर के अंगों को नियंत्रित किया जाता है।

जानकारों का मानना है कि इस स्थान पर चोटी रखने से मस्तिष्क का संतुलन बना रहता है। शिखा रखने से इस सहस्रार चक्र को जागृत करने और शरीर, बुद्धि व मन पर नियंत्रण करने में सहायता मिलती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सहस्रार चक्र का आकार गाय के खुर के समान होता है इसीलिए चोटी भी गाय के खुर के बराबर ही रखी जाती है।

चोटी रखने का महत्व

सुश्रुत संहिता में लिखा है कि मस्तक ऊपर सिर पर जहां भी बालों का आवृत (भंवर) होता है, वहां सम्पूर्ण नाडिय़ों व संधियों का मेल होता है। इस स्थान को ‘अधिपतिमर्म’ कहा जाता है। इस स्‍थान पर चोंट लगने पर मनुष्य की तत्काल मौत हो जाती है।

सुषुम्ना के मूल स्थान को ‘मस्तुलिंग’ कहते हैं। मस्तिष्क के साथ ज्ञानेन्द्रियों-कान, नाक, जीभ, आंख आदि का संबंध है और कर्मेन्द्रियों-हाथ, पैर, गुदा, इंद्रिय आदि का संबंध मस्तुलिंगंग से है। मस्तिष्क मस्तुलिंगंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं, उतनी ही ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की शक्ति बढ़ती है। माना जाता है कि मस्तिस्क को ठंडक की जरूरत होती है। जिसके लिए क्षौर कर्म और गोखुर के बराबर शिखा रखनी जरूरी होती है।

कुछ धार्मिक लेखों में यहां तक कहा गया है कि अगर व्यक्ति में अज्ञानता में या फैशन में आकर चोटी रखता है तो उसे फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है। इसी चोटी किसी जानकार की सलाह के आधार पर ही रखना चाहिए।

 

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