निर्जला एकादशी व्रत करने वाले मनुष्य को मिलता है 24 एकादशियों का पुण्य


ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष को जो एकादशी आती है उसे हम निर्जला एकादशी कहते हैं इसे पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी को बिना अन्न-जल ग्रहण किए व्रत करने का विधान है। हिन्दू रीति रिवाजों के अनुसार इस दिन जो कोई मनुष्य व्रत करता है वो न तो जल ग्रहण करता है और न ही अन्न ग्रहण करता है इस बार यह एकादशी 5 जून सोमवार को है।

निर्जला एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें और स्नान करके साफ कपड़े पहने फिर सर्वप्रथम भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके पश्चात मन को शांत रखते हुए ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें। निर्जला एकादशी के दिन गोदान का विशेष महत्त्व है। निर्जला एकादशी के दिन दान-पुण्य और गंगा स्नान का विशेष महत्त्व होता है । इस दिन अन्न, वस्त्र, जौ, गाय, जल, छाता, जूता आदि का दान देना शुभ माना जाता है। शाम को पुन: भगवान की पूजा करें व रात में भजन कीर्तन करते हुए धरती पर विश्राम करें।

अगले दिन किसी योग्य ब्राह्मण को आमंत्रित कर उसे भोजन कराएं तथा जल से भरे कलश के ऊपर सफेद वस्त्र ढक कर और उस पर शर्करा (शक्कर) तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें। इसके अलावा आप अपनी इच्छा अनुसार अन्न, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखा तथा फल आदि का दान भी कर सकते है । इसके बाद आप स्वयं भोजन करें।

निर्जला एकादशी व्रत कथा
भीमसेन महर्षि व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परन्तु मैं भोजन के बिना नहीं रह सकता हूँ महर्षि व्यास ने भीमसेन को कहा कि आप साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत करने की सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की 24 एकादशियों के बराबर है। इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी पांडव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।

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