ये है दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग, हर साल बढ़ता है इसका आकार


आज हम आपको बताने जा रहे है दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग के बारे में , जिसके दर्शन करके आप भी ध्यान हो जाएंगे । जी हाँ, हिन्दू शास्त्रों के अनुसार जो भी मनुष्य शिवलिंग की सच्चे मन से पूजा करता है उसका जीवन ध्यान हो जाता है । वैसे तो शिव भगवान मूर्ति और लिंग दोनों रूप में पूजे जाते है। भगवान शिव की महिमा को कौन नहीं जानता। भगवान शिव की पूजा तो सभी करते होंगे और बेशक उनके चमत्कारों के क़िस्सों से आप परिचित भी होंगे।

भारत देश के शिवालयों में एक ओर जहां शिवलिंग के आकार छोटे होते जाने की खबर आती है। वहीं भारत के राज्य छत्तीसगढ़ में एक ऐसा शिवलिंग भी है जहाँ शिवलिंग का आकार घटता नहीं है। बल्कि हर वर्ष शिवलिंग का आकार लगातार बढ़ रहा है। आपको यकीन तो नहीं हो रहा होगा पर ये सच्च है ।

ये भारत के राज्य छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित भूतेश्वरनाथ शिवलिंग संभवतः प्राकृतिक रूप से निर्मित दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग है। यह जमीन से लगभग 18 फीट ऊंचा और 20 फीट गोलाकार है। राजस्व विभाग द्वारा हर साल इसकी उचांई नापी जाती है, जिसमें हर वर्ष यह 6 से 8 इंच तक बढ़ा हुआ पाया जाता है।

गरियाबंद जिला मुख्यालय से 3 km दूर घने जंगलों के बीच बसे मरौदा गांव में यह शिवलिंग स्थित है। 12 ज्योतिर्लिंगों की तरह इसे भी अर्धनारीश्वर शिवलिंग होने की मान्यता प्राप्त है। इस शिवलिंग का दर्शन करने और जलाभिषेक करने हर वर्ष सैकड़ों की संख्या में कांवरिए पैदल यात्रा कर यहां पहुंचते हैं। संभवत: इसलिए यहां पर हर वर्ष पैदल आने वाले भक्तों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।

इस शिवलिंग का पौराणिक महत्व सन 1959 में गोरखपुर से प्रकाशित धार्मिक पत्रिका कल्याण के वार्षिक अंक में उल्लेखित है, जिसमें इसे विश्व का एक अनोखा विशाल शिवलिंग बताया गया है।

इस शिवलिंग के बारे में बताया जाता है कि कई सौ साल पहले शोभा सिंह नाम का जमींदार की यहां पर खेती-बाड़ी थी। वो हर शाम अपने खेत में घूमने जाते थे। फिर एक दिन अचानक उस खेत के पास एक विशेष आकृतिनुमा टीले से सांड के हुंकारने और शेर के दहाड़ने की आवाज आती थी। शोभा सिंह ने यह बात ग्रामवासियों को बताई। फिर ग्रामवासियों ने आसपास ढूँढा परंतु दूर दूर तक कोई जानवर नहीं मिला। एक छोटा सा शिवलिंग ज़रूर मिल गया और देखते ही देखते हर किसी की उसमें आस्था बढ़ने लगी। और जल्द ही वहाँ पूजा-अर्चना का केंद्र बन गया और तब से लेकर हर साल उसका आकार बढ़ रहा है और लोगों का उसमें विश्वास भी। लोग इस टीले को शिवलिंग के रूप में मानने लगे।

पारागांव के लोगों कहना है कि पहले यह टीला छोटे रूप में था पर धीरे-धीरे इसकी उंचाई व गोलाई बढ़ती गई। इसका बढ़ना आज भी जारी है। लोग इस टीले को शिवलिंग के रूप में पूजने लगे। इस शिवलिंग में प्रकृति प्रदत्त जलहरी भी दिखाई देती है, जो धीरे-धीरे जमीन के ऊपर आती जा रही है। छत्तीसगढ़ी भाषा में हुंकारने की आवाज को भकुर्रा कहते हैं, इसी से भूतेश्वरनाथ को भकुर्रा महादेव भी कहते हैं।

आस्था और विश्वास के आगे कोई तर्क नहीं चलता और शायद यही कारण है कि वैज्ञानिक भी अभी तक ये पता नहीं लगा पाये हैं कि क्यों इस शिवलिंग की लम्बाई और गोलाई हर साल लगातार अपने आप ही बढ़ी जा रही है।

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