आखि‍र क्यों है सावन का महीना श‍िव शंकर को इतना प्रिय, जानें ! क्या है शिव और शंकर में अंतर


सावन का महीना चल रहा है, चारों और शि‍व भक्त भोले के रंग में रंगे हैं, जय शि‍व शंकर के नारे गूंज रहे हैं। कहते हैं कि भगवान शिव को सावन का महीना बेहद प्रिय है। इस माह में श‍िव भक्त उन्हें प्रसन्न करने के का हर प्रयास करते हैं। इस माह में श‍िव की पूजा बहुत अहम मानी जाती है। जानिए आखि‍र क्या हैं वे कारण या मान्यताएं, जो सावन मास में श‍िव के पूजन के महत्व को बढ़ा देती हैं।

1. मान्यता है कि सावन माह में ही समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मंथन के बाद जो विष निकला, उससे पूरा संसार नष्ट सकता था, लेकिन भगवान श‍िव ने उस विष को अपने कंठ में समाहित किया और सृष्ट‍ि की रक्षा की। इस घटना के बाद ही भगवान श‍िव का वर्ण नीला हो गया और उन्हें नीलकंठ भी कहा गया। कहते हैं कि श‍िव ने जब विष पिया, तो उसके असर को कम करने के लिए देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया था। यह भी एक अहम वजह है कि सावन में श‍िव को जल चढ़ाया जाता है।

2. मान्यता है कि सावन के महीने में विष्णु जी योगनिद्रा में जाते हैं। सृष्टि के संचालन का काम शिव देखते हैं। इसलिए ये समय भगवान श‍िव के भक्तों के लिए अहम माना जाता है। यही वजह है कि शि‍व को सावन के प्रधान देवता के रूप में पूजा जाता है।

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3. मान्यता है कि सावन के माह में ही भगवान शिव पृथ्वी पर अवतरित हुए और अपनी ससुराल पहुंचे थे। ससुराल में शि‍व का स्वागत अर्घ्य और जलाभिषेक से किया गया। यही वजह है कि सावन माह में श‍िव को अर्घ्य और जलाभिषेक किया जाता है।

4. हिंदू मान्यता है कि हर साल श‍िव सावन में अपने ससुराल जाते हैं. यानी यही वह समय है, जब वे धरती पर रहने वाले लोगों के आसपास होते हैं और वे उनकी कृपा पा सकते हैं।

जानें ! क्या है भगवान शिव और शंकर में अंतर

जब भी भगवान शिव की बात होती है तो हम शिव और शंकर को एक ही समझ लेते हैं लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। शिव और शंकर में भिन्नता है। इन दोनों की प्रतिमाएं भी अलग-अलग आकार वाली होती हैं। शिव की प्रतिमा अण्डाकार अथवा अंगुष्ठाकार होती है जबकि महादेव शंकर की प्रतिमा शारारिक आकार वाली होती है। इसके अलावा भी शिव और शंकर में अनेक अंतर है। चलिए हम आपको बताते हैं कि भगवान शिव और शंकर अलग-अलग कैसे हैं …

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महादेव शंकर :-

यह ब्रह्मा और विष्णु की तरह सूक्ष्म शरीरधारी हैं। इन्हें ‘महादेव’ कहकर पुकारा जाता है परन्तु इन्हें ‘परमात्मा’ नहीं कहा जा सकता।

महादेव ब्रह्मा तथा विष्णु की तरह ही सूक्ष्म लोक में यानि शंकरपुरी में वास करते हैं।

ब्रह्मा तथा विष्णु की तरह यह भी परमात्मा शिव की रचना है।

यह केवल महाविनाश का कार्य करते है, स्थापना और पालना के कर्तव्य इनके अधिकार में नहीं हैं।

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परमपिता परमात्मा शिव :-

यह चेतन ज्योति-बिन्दु है और इनका अपना कोई स्थूल या सूक्ष्म शरीर नहीं है, यह परमात्मा है।

परमात्मा शिव ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर के लोक, अर्थात सूक्ष्म देव लोक से भी परे ‘ब्रह्मलोक’ (मुक्तिधाम) में वास करते है।

परमात्मा शिव ने ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर की रचना की है।

परमात्मा शिव के हाथों में ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर को दी हुई तीनों शक्तियां हैं ये जब चाहें जीव की उत्पत्ति कर सकते हैं और जब चाहें संहार कर सकते हैं।

जानें! किस पूजा साम्रगी से कौन सी राशि वालों को अधिक लाभ मिलता है

सावन के प्रधान देवता शिव हैं । उन्हें सर्वाधिक प्रसन्न करने का सर्वोत्तम उपाय गंगाजल से जलाभिषेक है। सावन के सोमवार को शिव अर्चना का विशेष महत्व होता है। सावन में किस प्रकार शिव की आराधना विशेष फलादयी हो जाती है, सावन शिव को अत्यंत प्रिय क्यों है, धर्मग्रंथों में इसकी प्रसंगवश व्याख्या की गई है। सावन के महीने में शिवजी को रोजाना बिल्व पत्र चढ़ाए। बिल्व पत्र की संख्या 108 हो तो सबसे अच्छा परिणाम मिलता है।

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शिवजी का पूजन कर निर्माल्य का तिलक लगाए तो भी जल्दी विवाह के योग बनते हैं। हर सोमवार खासतौर पर सावन माह के सोमवार को शिवलिंग का जल या पंचामृत से अभिषेक करें। कालसर्प दोष के निवारण के लिये नाग पंचमी के दिन शिव की पूजा कर चांदी के नाग का जोड़ा चढ़ाएं और एक जोड़ा चांदी का सर्प बहते जल में बहाएं। कालसर्प योग हो और जीवन में लगातार गंभीर बाधा आ रही हो तब किसी विद्वान ब्राह्मण से राहु और केतु के मंत्रों का जप कराया जाना चाहिए और उनकी सलाह से राहु और केतु की वस्तुओं का दान या तुलादान करना चाहिए।

सावन में हर राशि का व्यक्ति शिव पूजन से पहले काले तिल जल में मिलाकर स्नान करे। शिव पूजा में कनेर, मौलसिरी और बेलपत्र जरुर चढ़ावें। इसके अलावा जानते हैं कि किस राशि के व्यक्ति को किस पूजा सामग्री से शिव पूजा अधिक शुभ फल देती है…

  • मेष – इस राशि के व्यक्ति जल में गुड़ मिलाकर शिव का अभिषेक करें। शक्कर या गुड़ की मीठी रोटी बनाकर शिव को भोग लगाएं। लाल चंदन व कनेर के फूल चढ़ावें।
  • वृष– इस राशि के लोगों के लिए दही से शिव का अभिषेक शुभ फल देता है। इसके अलावा चावल, सफेद चंदन, सफेद फूल और अक्षत यानि चावल चढ़ावें।
  • मिथुन – इस राशि का व्यक्ति गन्ने के रस से शिव अभिषेक करे। अन्य पूजा सामग्री में मूंग, दूर्वा और कुशा भी अर्पित करें।
  • कर्क – इस राशि के शिवभक्त घी से भगवान शिव का अभिषेक करें। साथ ही कच्चा दूध, सफेद आंकड़े का फूल और शंखपुष्पी भी चढ़ावें।
  • सिंह – सिंह राशि के व्यक्ति गुड़ के जल से शिव अभिषेक करें। वह गुड़ और चावल से बनी खीर का भोग शिव को लगाएं। गेहूं और मंदार के फूल भी चढ़ाएं।
  • कन्या – इस राशि के व्यक्ति गन्ने के रस से शिवलिंग का अभिषेक करें। शिव को भांग, दुर्वा व पान चढ़ाएं।
  • तुला – इस राशि के जातक इत्र या सुगंधित तेल से शिव का अभिषेक करें और दही, शहद और श्रीखंड का प्रसाद चढ़ाएं। सफेद फूल भी पूजा में शिव को अर्पित करें।
  • वृश्चिक – पंचामृत से शिव का अभिषेक वृश्चिक राशि के जातकों के लिए शीघ्र फल देने वाला माना जाता है। साथ ही लाल फूल भी शिव को जरुर चढ़ाएं।
  • धनु – इस राशि के जातक दूध में हल्दी मिलाकर शिव का अभिषेक करे। भगवान को चने के आटे और मिश्री से मिठाई तैयार कर भोग लगाएं। पीले या गेंदे के फूल पूजा में अर्पित करें।
  • मकर – नारियल के पानी से शिव का अभिषेक मकर राशि के जातकों को विशेष फल देता है। साथ ही उड़द की दाल से तैयार मिष्ठान्न का भगवान को भोग लगाएं। नीले कमल का फूल भी भगवान का चढ़ाएं।
  • कुंभ – इस राशि के व्यक्ति को तिल के तेल से अभिषेक करना चाहिए। उड़द से बनी मिठाई का भोग लगाएं और शमी के फूल से पूजा में अर्पित करें। यह शनि पीड़ा को भी कम करता है।
  • मीन – इस राशि के जातक दूध में केशर मिलाकर शिव पर चढ़ाएं। भात और दही मिलाकर भोग लगाएं। पीली सरसों और नागकेसर से शिव का चढ़ाएं।
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