रहस्यमयी मंदिर! रात होते ही यहां हर इंसान बन जाता है पत्थर


दुनिया में कई तरह की अजीब घटनाओं के बारे में सुनने को मिलता है। कुछ घटनाओं पर तो यकीन हो जाता है लेकिन कुछ के बारे में सुनकर ऐसा लगता है कि यह लोगों की मनगढ़ंत कहानी है। ऐसा लगता है जैसे व्यक्ति किसी कहानी को सुना रहा है। हमारे देश में ही कई ऐसी रहस्यमयी चीजें हैं, जिनके बारे में कोई पता नहीं लगा पाया है।

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किराडू को “राजस्थान का खजुराहो” भी कहा जाता है, लेकिन किराडू को खजुराहो जैसी ख्याति नहीं मिल पाई क्योंकि यह जगह पिछले 900 सालों से वीरान है और आज भी यहां पर दिन में कुछ चहल–पहल रहती है पर शाम होते ही यह जगह वीरान हो जाती है, सूर्यास्त के बाद यहां पर कोई भी नहीं रुकता।

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राजस्थान के बाड़मेर में स्थित किराडू अपने मंदिरों की शिल्प कला के लिया विख्यात है। इन मंदिरों का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था। माना जाता है कि किराडू शहर प्राचीन समय में सुख-सुविधाओं से युक्त एक विकसित प्रदेश हुआ करता था। दूसरे प्रदेशों के लोग यहां पर व्यापार करने आते थे, लेकिन 12वीं शताब्दी में, जब किराडू पर परमार वंश का राज था, उसके पश्चात यह शहर वीरान हो गया।

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आखिर ऐसा क्यों हुआ, इसकी कोई पुख्ता जानकारी तो इतिहास में उपलब्ध नहीं है पर इसे लेकर एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है। पूरे राजस्थान में खजुराहो मंदिर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर प्रेमियों को विशेष आकर्षित करता हैं। लेकिन यहां की ऐसी खौफ़नाक सच्चाई है जिसे जानने के बाद कोई भी यहां शाम के बाद ठहरने की हिम्मत नहीं कर सकता।

आखिर क्या हुआ था यहां ?

यहां के लोगों की मान्यता है कि इस शहर पर एक साधु का श्राप लगा हुआ है। मान्यता के अनुसार करीब 900 साल पहले परमार राजवंश यहां राज करता था। उन दिनों इस शहर में एक ज्ञानी साधु भी रहने आए थे। यहां पर कुछ दिन बिताने के बाद साधु देश भ्रमण पर निकले तो उन्होंने अपने साथियों को स्थानीय लोगों के सहारे छोड़ दिया।

जब दिया गया श्राप

एक दिन सारे शिष्य बीमार पड़ गए और बस एक कुम्हारिन को छोड़कर अन्य किसी भी व्यक्ति ने उनकी देखभाल नहीं की। साधु जब वापस आए तो उन्हें यह सब देखकर बहुत क्रोध आया। साधु ने कहा कि जिस स्थान पर दया भाव ही नहीं है वहां मानवजाति को भी नहीं होना चाहिए। उन्होंने संपूर्ण नगरवासियों को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। जिस कुम्हारिन ने उनके शिष्यों की सेवा की थी, साधु ने उसे शाम होने से पहले यहां से चले जाने को कहा और यह भी सचेत किया कि पीछे मुड़कर न देखे।

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सूर्यास्त के बाद हो जाता है वीरान

लेकिन कुछ दूर चलने के बाद कुम्हारिन ने पीछे मुड़कर देखा और वह भी पत्थर की बन गई। इस श्राप के बाद अगर शहर में शाम ढलने के पश्चात कोई रहता था तो वह पत्थर का बन जाता था और यही कारण है कि यह शहर सूरज ढलने के साथ ही वीरान हो जाता है। खैर किराडू के बारे में यह कहानी कितनी सही है और कितनी गलत इसका तो पता नहीं। कुछ इतिहासकारों का मानना यह है कि किराडू मुगलों के आक्रमण के कारण वीरान हुए, लेकिन इस प्रदेश में मुगलों का आक्रमण 14वीं शताब्दी में हुआ था और किराडू 12वीं शताब्दी में ही वीरान हो गया था इसलिए इसके वीरान होने के पीछे कोई और ही कारण है।

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कैसे हुआ मंदिरों का निर्माण ?

किराडू के मंदिरों का निर्माण किसने कराया इसकी भी कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि यहां पर 12वीं शताब्दी के तीन शिलालेख उपलब्ध हैं पर उन पर भी इनके निर्माण से सम्बंधित कोई जानकारी नहीं है। इतिहासकारों का मत है कि किराडू के मंदिरों का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था तथा इनका निर्माण परमार वंश के राजा दुलशालराज और उनके वंशजों ने किया था। किराडू में किसी समय पांच भव्य मंदिरों की एक श्रृंखला थी। आज इन पांच मंदिरों में से केवल विष्णु मंदिर और सोमेश्वर मंदिर ही ठीक हालत में है।

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