‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की सफलता को लेकर कई दिग्गज थे असमंजस में


नयी दिल्ली : आजादी की लड़ाई के दौरान 75 वर्ष पूर्व शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन अब देश के इतिहास का एक ऐसा यादगार अध्याय बन गया है, जिसे आज नयी पीढ़ी को जानने की जरूरत है कि किस तरह शहीदों के शौर्य एवं बलिदान के कारण लंबे संघर्ष के बाद यह आजादी मिली थी लेकिन शुरू में इस आंदोलन की सफलता को लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद सशंकित थे तथा चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने तो इसके विरोध में कांग्रेस ही छोड़ दी थी।

आज सम्पूर्ण राष्ट्र एक बार फिर 1942 की इस क्रांति को याद कर रहा है और उस स्मृति को ताजा करने के लिए देश में अनेक स्थानों पर समारोह , कार्यक्रम तथा संगोष्ठियां आदि आयोजित की जा रही हैं। संसद के दोनों सदनों में नौ अगस्त को अगस्त क्रांति के शहीदों को योगदान को याद किया किया जाएगा और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी।

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भारत छोड़ो आंदोलन भले ही मुम्बई के ऐतिहासिक अगस्त क्रांति मैदान से नौ अगस्त को शुरू हुआ था पर इस संबंध में पहला प्रस्ताव 14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेसकार्यसमिति की बैठक में पारित हुआ था लेकिन इस प्रस्ताव के विरोध में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया था। पंडित नेहरू और मौलाना आजाद भी इस आंदोलन को लेकर सशंकित थे लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद  और अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे कांग्रेसी नेता इसका समर्थन कर रहे थे और जयप्रकाश नारायण तथा अशोक मेहता जैसे समाजवादियों ने भी इसका समर्थन किया था। मुस्लिम लीग, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कम्युनिस्ट पार्टी और हिन्दू महासभा ने आंदोलन का विरोध किया था। अरुणा आसफ अली ने नौ अगस्त को कांग्रेस अधिवेशन में झंडा फहराया था।

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वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति ने ही अंग्रेजो भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया था लेकिन इसके बाद आठ अगस्त 1942 को मुम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक में कार्यसमिति ने इस प्रस्ताव को कुछ संशोधनों के साथ स्वीकार कर लिया था। इस ऐतिहासिक सम्मेलन में महात्मा गांधी ने करीब 70 मिनट तक भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था, “मैं आपको मंत्र देता हूं-करो या मरो, जिसका अर्थ था-भारत की जनता देश की आजादी के लिए हर ढंग का प्रयत्न करे।”

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पट्टाभि सीतारमैया के अनुसार वास्तव में गांधी जी उस दिन पैगम्बर और ईश्वर के  अवतार की प्रेरक शक्ति से प्रेरणा लेकर भाषण दे रहे थे और कह रहे थे, जो लोग कुर्बानी देना नहीं जानते, वे आजादी प्राप्त नहीं कर सकते। नौ अगस्त की सुबह इस आंदोलन की शुरूआत होते ही कांग्रेस के सभी महत्वपूर्ण नेता गिरफ्तार कर लिए गए। अंग्रेजों ने इस कार्रवाई को ऑपरेशन ‘जीरो आवर’ का नाम दिया था। गांधी जी पुणे के आगा खां महल में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गिरफ्तार किये गये जबकि कांग्रेस कार्यकारिणी के अन्य सदस्यो को अहमदनगर के दुर्ग में रखा गया।

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इस आंदोलन में समाजवादियों ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी और जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली, यूसुफ मेहर अली, अच्युत पटवर्धन, एस एम जोशी और रामवृक्ष बेनपुरी जैसे नेताओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। इसके साथ ही मुम्बई, अहमदाबाद और दूसरे शहरों में मजदूरों ने विशाल हड़ताल की थी और बलिया, बस्ती, सतारा, मिदनापुर और बिहार के कुछ हिस्सों में समानान्तर सरकारें भी स्थापित की गयीं। देखते-देखते इस आंदोलन की चिंगारी पूरे देश में फैल गयी और हजारों लोग जेल में बंद कर दिये गए तथा कई लोग पुलिस दमन और अत्याचार के शिकार हुए ।

बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मद्रास और मुम्बई में इस आंदोलन का सर्वाधिक असर हुआ । जयप्रकाश नारायण, लोहिया और अरुणा आसफ अली ने भूमिगत रहकर इस आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया था। मुम्बई में उषा मेहता जैसी प्रखर समाजवादी नेता ने कई  महीनों तक कांग्रेस रेडियो का प्रसारण किया। लोहिया भी नियमित रूप से इस रेडियो पर देशवासियों को अंग्रेजों के खिलाफ संदेश देते थे और उन्हें जागृत करने की प्रेरणा देते थे। नवम्बर,1942 में पुलिस ने इस भूमिगत रेडियो प्रसारण का पता लगाकर इसे जब्त कर लिया।

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इस आंदोलन में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद ङ्क्षहद फौज को दिल्ली चलो का नारा दिया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसमें करीब एक हजार लोग मारे गए थे और साठ हजार से अधिक लोग गिरफ्तार हुए थे। नौ अगस्त को लालबहादुर शास्त्री भी गिरफ्तार कर लिए गये थे। उस दिन काकोरी कांड स्मृति दिवस मनाने की परम्परा भगत सिंह ने शुरू की थी, इसीलिए इस आंदोलन के लिए यह तिथि तय की गयी। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अठारह हजार लोग नजरबंद किये गए थे।

अगस्त क्रांति आंदोलन की आग गांव-गांव में फैल चुकी थी। इस क्रांति ने अंग्रेजों की नींद हराम कर दी, जिससे ब्रिटिश पुलिस को नाको चने चबाने पड़ें। इतिहासकारों के अनुसार 1857 के विद्रोह के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन था, जिसका असर भारतीय जनमानस पर पड़ा। इस आंदोलन का इतना व्यापक असर हुआ कि अंग्रेजों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा।

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