ये है एक ऐसी जगह जहां लोग रोते हुए आते है और हंसते हुए जाते है


आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास खुद के लिए जरा सा भी वक़्त नही है कि वे कुछ पल हंस ले या रो ले। जीवन में जैसे सुख और दुख एक सिक्के के दो पहलू है वैसे ही हंसने के साथ रोना भी जरूरी है। जैसे हंस के हम अपनी भावनाओं को व्यक्त करते है वैसे ही रोना भी अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का एक तरीका है। लेकिन जिंदगी की इस दौढ़ में सब इतने व्यस्त है कि रोने तक की फुर्सत नहीं है, यही कारण है कि डिप्रेशन के मामले लगातार बढ़ रहे है।

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लोगों को इस समस्या से बचाने के लिए गुजरात के सूरत में क्राइंग क्लब शुरू किया गया है, जहां इंसान रो कर अपने दिल के बोझ को हल्का कर सकता है। इतना ही नहीं, इस क्लब में हर रविवार को क्राइंग थैरेपी की क्लास कराई जाती है। यहां आकर लोग अपने तनाव और अकेलेपन को दूर करते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लोगों को रुलाने के लिए उन्हें जिंदगी के बुरे पल और दुखद घटनाएं याद दिलाई जाती हैं। साथ ही, उन्हें उस बात को याद करने के लिए भी कहा जाता है, जिसे याद कर वे सबसे ज्यादा भावुक हो जाते हैं।

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ये देश का पहला क्राइंग क्लब बताया जा रहा है। इस क्लब की स्थापना लॉफ्टर थैरेपिस्ट और साइक्लोजिस्ट कमलेश मसालावाला ने की है। पहले दिन 80 लोगों ने क्राइंग थैरेपी ली। कमलेश ने अलग-अलग तरीकों से लोगों को रुलाने की कोशिश की। इस क्लब की सबसे रोचक बात तो यह है कि इस सेशन में साइलेंट क्राइंग का भी एक सत्र रखा गया। इस सत्र के दौरान लोगों को आंख बंद करके रोने के लिए कहा गया। क्राइंग क्लास में हर किसी ने अपनी लाइफ से जुड़ी एक बुरी घटना को एक दूसरे से शेयर किया। हालांकि इसकी कोई फीस नहीं रखी गई है।

आपको बता दें कि क्राइंग थैरेपी एक वेंटिलेटर थैरेपी है, इसमें व्यक्ति को रुलाकर उसके शरीर से हानिकारक टॉक्सिन को बाहर निकाला जाता है। जब वह किसी बात को लेकर रोता है तो आंसू से आंख को तकलीफ देने वाला पदार्थ निकल जाता है। डॉक्टरों के मुताबिक रोने से तनाव दूर होता है, ब्लड प्रेशर नॉर्मल और ब्लड सर्कुलेशन सामान्य रहता है। इंसान का भावुक होना जरूरी होता है।

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सभी परेशानियां डिप्रेशन नहीं होती..

सबसे पहले आपको बता दें कि सभी परेशानियों को डिप्रेशन का नाम देना ठीक नहीं है। हमने खुद को इतना संवेदनशील और अविवेकी बना लिया है कि जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव को झेल नहीं पाते। जीवन में आई परेशानियां और चुनौतियों को स्वीकार करने की बजाय हम उनसे भागने लगते हैं।

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जब हम चुनौतियों से भागने की कोशिश करते है तो ये और भी ज्यादा विकराल रूप ले लेती हैं और अंत में जब हम इनसे डील नहीं कर पाते तो जो दबाव हम महसूस करते हैं उसे डिप्रेशन का नाम दे देते हैं। यह सही नहीं हैं। जीवन में आने वाली चुनौतियों को स्वीकार कर उनसे लड़ें, न कि उन्हें डिप्रेशन का नाम दें।

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बिलिव थैरेपी..

डिप्रेशन में जाने की एक बड़ी वजह है कि हम खुद पर बिलिव कम होना। अक्सर ऐसा होता है कि जब हम परेशानी का  सोल्युशन नहीं पा पाते तो हम खुद में ही कमियां तलाशते हैं और यह सबकी आदत सी हो गई है। आज कल कोई खुद से खुश नहीं ताे किसी की परेशानी की वजह कोई और है। बहुत सी ऐसी चीजे होती है जब हम खुद में बहुत सी कमियां तलाश कर, खुद से नफरत करना शुरू कर देते हैं। हम मान लेते हैं कि हम अच्छे नहीं है। यही यकीन डिप्रेशन को जन्म देता है। इसलिए आज से ही खुद से प्यार करना और खुद पर यकीन करना शुरू करें।

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हर दोस्त दोस्त नहीं होता..

आज के समय में युवा पर जिस चीज पर सबसे ज्यादा प्रेशर महसूस करते हैं वह है पियर प्रेशर। जी हां, अक्सर हम अपने साथ पढ़ने वाले ग्रुप कुछ साल से साथ रहे दोस्तों को ही अपना सच्चा साथी मान बैठते हैं। खुद को उनकी नजरों में सही रखना, उनकी हर सलाह को मानना और कई ऐसे काम जो हम करना बिलकुल नहीं चाहते, लेकिन उन दोस्तों के दबाव और दोस्ती के नाम पर कर बैठते हैं।

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ऐसे कामों का अंत होता है डिप्रेशन पर, जब आप लगातार वह काम करते हैं, जिन्हें करने के लिए आपका मन नहीं मानता या आप खुश नहीं हैं, तो चाहे आपके पास कितने ही दोस्त क्यों न हों, अंत में आप खुद को अकेला ही पाएंगे। इसलिए यह जरूरी है कि आप इस बात की सही पहचान करें कि कौन असल में आपका दोस्त है और किससे आपकी ज्यादा जान पहचान है।

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उम्मीदों को खुद पर हावी न होने दें..

आपकी उम्मीदें आपके डिप्रेशन की सबसे बड़ी वजह है। जी हां, कुछ उम्मीदें लोगों को हमसे होती हैं और उसी मात्रा में या उससे अधिक हमें लोगों से। जब ये उम्मीदें पूरी नहीं हो पाती, तो ये मानसिक अशांति और अंतर्द्वंद डिप्रेशन को जन्म देती है। कई बार परिवार वाले बच्‍चों से बेहद अपेक्षा करते हैं और उन पर दबाव बनाते हैं, तो कई बार बच्चे अपने परिजनों से उनकी अपेक्षाएं पूरी करने का दबाव बनाते हैं। तो बेहतर है कि आप न ही दूसरों से अपेक्षा करें और न ही उनकी अपेक्षाओं को खुद पर हावी होने दें।

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