भारत की यह नदी, जो सदियों से उगल रही है सोना, वैज्ञानिकों के लिए बनी पहेली!


भारत देश में सैकड़ो नदियां हैं जो अपने आप में बहुत सी बाते समेटे हुए हैं। हर नदी अपने आप में महान है और हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण भी होती हैं। भारत को सोने के चिड़िया कहा जाता था, प्राचीन समय में विश्व का लगभग आधा सोना भारत से ही जाता था और भारत में हर किसी के पास सोना होता था।

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आज हम आपको बताएंगे एक ऐसी नदी के बारे में जिसके रेत से सोने की कर निकलते हैं और यह आज से नहीं बल्कि सैकड़ो सालों से हो रहा है. इस नदी से निकलते हुए सोने के कण का भी अपना एक रहस्य है. यह प्रकृति का एक ऐसा अद्भुत खेल है जो आज तक कोई नहीं सुलझा पाया।

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किसी नदी में रेत की सोने के कण, यह बात सुनने में थोड़ी अजीब जरूर लगती है. लेकिन, हमारे देश में एक ऐसी नदी है जिसके रेत से सैकड़ों सालों से सोना निकाला जा रहा है. हालांकि, आज तक रेत में सोने के कण मिलने का सही वजह का पता नहीं लग पाया. यहां के स्थानीय लोगों का कहना है, कि आज तक बहुत सारी सरकारी मशीनों द्वारा शोध किया गया लेकिन वे इस बात का पता लगाने में असमर्थ रहें कि आखिर यह कण जमीन के किस भाग से विकसित हो रहे हैं.

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इस नदी से जुड़ी एक और आश्चर्यजनक तथ्य हैं कि रांची में स्थित ये नदी अपने उद्गम स्थल से निकलने के बाद उस क्षेत्र के किसी भी नदी से जाकर नहीं मिलती है, बल्कि ये सीधे बंगाल की खाड़ी में जाकर ही मिलती है. भू वैज्ञानिकों का मानना है कि नदी तमाम चट्टानों से होकर गुजरती है इसी दौरान घर्षण की वजह से सोने के कण इसमें घुल जाते हैं. लेकिन आज तक इसका सटीक सटीक प्रमाण नहीं मिल पाया.

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स्वर्ण रेखा नदी दक्षिण छोटा नागपुर के पठारी भूभाग में रांची जिले के नगरी गांव से निकलती है. इस गांव के एक छोड़ से दक्षिणी कोयला तो दूसरे छोड़ से स्वर्ण रेखा नदी का उद्गम होता है. झारखंड में तमाड़ और सारण जैसी जगहों पर नदी के पानी में स्थानीय निवासी रेत के कणों में से सोने के कणों को इक्कठा करने का काम करते हैं. कहां जाता है की, इस काम में कई परिवार की पीढ़ियां लगी हुई है. सिर्फ पुरुष ही नहीं बल्कि उनके साथ महिला और बच्चे और घर के सभी सदस्य भी पानी से रेत छान कर सोने के कण को निकालने का काम करते हैं।

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यहां पर काम करने वालों के मुताबिक आमतौर पर एक व्यक्ति दिन भर में काम करने के बाद सोने की एक या दो कण हीं निकाल पाता है। जिस प्रकार मछलियों को पकड़ने के लिए जाल बिछाया जाता है, ठीक उसी प्रकार यहां के आदिवासी सोने के कणों को निकलने के लिए नदी में जाल की तरह टोकरा फेंकते हैं। इस टोकरे में कपड़ा लगा होता है, जिनमे नदी की भूतल रेत फास जाती है। नदी से निकाले गए रेत को आदिवासी घर ले जाते हैं और दिन भर उस रेत से सोने के कण को अलग करते रहते हैं। ये सोने की कण चावल के दाने या उससे कुछ बड़े होते हैं।

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नदी से सोना छानने के लिए बेहद धैर्य और मेहनत की जरुरत होती है. एक व्यक्ति माह (महीने) भर में 60 या 80 सोने के कण निकाल पाता है. रेत में सोने के कण छानने का काम साल भर होता रहता है सिर्फ बाढ़ के दौरान 2 माह तक यह काम बंद हो जाता है।

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रांची से बहने वाली यह नदी यहां के आदिवासियों की कमाई का एकमात्र स्रोत है. उनके न जाने कितनी पीढियां इस काम में लगी हुई है. पर इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद भी इतनी महंगी धातु के बदले उन्हें कौड़ी के माफिक दाम मिलता है, जिससे उनका पेट ही मुश्किल से भर पता है।

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