योग को उसका सही स्थान मिलना चाहिए : कोहली


योग विशेषज्ञों का मत है कि पूर्ण विज्ञान की मान्यता मिले बगैर योग को जो स्थान मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पायेगा। गुरू गोरखनाथ योग संस्थान एवं महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद, द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक योग प्रशिक्षण शिविर एवं योग-अध्यात्म-शैक्षिक कार्यशाला में ‘योग एवं विज्ञान’ विषय पर बोलते हुए राजेन्द्र प्रसाद ताराचन्द महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. वाई.पी. कोहली ने कहा कि जब तक छात्र एवं छात्राओं को योग की शिक्षा एक विशेष विज्ञान विषय के रूप में नहीं दी जायेगी और उनमें इसके प्रति रूचि नहीं उत्पन्न करायी जायेगी तब तक यह सम्भव नहीं हो सकेगा।

source

डा. कोहली ने कहा कि योग विज्ञान के माध्यम से ही हमारे पूर्वजों ने भारत को विश्वगुरू बनाया था, आज भी हम योग के माध्यम से अपने उस वैभव को प्राप्त कर सकते है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा प्रयास किये जा रहे है फिर भी जबतक योग को पाठ्यक्रमों में विज्ञान की एक अलग शाखा के रूप में नहीं पढ़ाया जायेगा तबतक योग विज्ञान को जो स्थान मिलना चाहिए वह नहीं मिलेगा। डा. कोहली ने कहा कि हमारे ऋषियों ने योग को विज्ञान माना है, क्योंकि योग की एक क्रमबद्ध पद्धति है जो विज्ञान के सभी अवयवों को समाहित किये हुए है।

योग इन अर्थों में विज्ञान है कि योग के माध्यम से अनेक प्रकार के रोगों को दूर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि योग के आसनों एवं प्राणायाम के विविध तरीकें है जो अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने में सहायक होते है। उन्होंने कहा कि सर्वांगासन के द्वारा इस्नोफिलिया, गोरक्षासन के द्वारा स्वप्नदोष को दूर किया जा सकता है। ‘मुद्रा एवं वन्ध’ विषय पर बोलते हुए अध्यक्षता कर रहे कटक उड़ीसा से पधारे महन्त योगी शिवनाथ ने कहा कि आसन एवं प्राणायाम के अभ्यास के बाद महामुद्रा की साधना की जाती है।

source

मुद्रा की कुछ विधियों का अभ्यास, आसन और प्राणायाम के साथ स्वत: करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि मुद्रा की उच्चतर और अपेक्षाकृत कठिन विधियॉ उच्चतर उपलब्धियों के लिए निर्धारित है। उन्होंने कहा कि मुद्रा की उच्चतर विधियों में विशेषत: दस विधियों-महामुद्रा, महाबन्ध, महाबेध, खेचरी, उद्धान, मूलबन्ध, जालान्धर बन्ध विपरित करनी, बज्रोली और शक्तिचालन का उल्लेख मिलता है और यह सभी पूर्णत: व्यवहारिक है, इन्हें योज्ञ गुरु के प्रत्यक्ष निर्देशन में उचित अभ्यास के द्वारा ही समझा जा सकता है।

source

महन्त ने कहा कि इनके अभ्यास से प्रत्येक व्यक्ति की मनोभौतिक प्रकृति के अन्तराल में सोई हुई आध्यात्मिक शक्ति को जागृत किया जा सकता है। केन्द्रित मनोप्राण शक्ति को सभी दिशाओं से समेट कर अन्तरतम नाड़ी सुषुम्ना के माध्यम से उच्चतर भूमिकाओं की ओर उन्मुख किया जा सकता है। महामुद्रा के अभ्यास से उच्चतम आध्यात्मिक भूमि में अनुभूति होने वाली शिव और शक्ति की आनन्दमयी एकता की अनुभूति हो जाती है।’बन्ध’ से थाइराइड एवं डिप्रेशन जैसे बीमारियों से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है।’खेचरी’ का अभ्यास करने से वृद्ध शरीर भी यौवन हो जाता है।

Choose A Format
Poll
Voting to make decisions or determine opinions
Story
Formatted Text with Embeds and Visuals
List
The Classic Internet Listicles
Video
Youtube, Vimeo or Vine Embeds
Thanks for loving our story. Like our Facebook page to get more stories.

Send this to a friend