भारतीय फुटबॉल को महानायकों की तलाश


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नई दिल्ली: देर से ही सही सरकार ने फुटबॉल की महानता को स्वीकारा है और हर स्तर पर इस खेल को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन भारतीय फुटबॉल का दुर्भाग्य देखिए कि उसके अपने ही विदेशी का मोह नहीं छोड़ पा रहे। जी हां, भारतीय फुटबॉल के अपने ही उसके दुश्मन बने हुए हैं। वरना क्या कारण है कि आईएसएल और आईलीग के चलते तमाम स्टेडियम आधे अधूरे भी नहीं भर पा रहे जबकि स्पेन, जर्मनी, इंग्लैंड, फ्रांस आदि देशों की लीग में हाज़िरी हजारों में होती है। शायद ही किसी बड़े मुकाबले में कोई सीट खाली मिले। भारतीय फुटबॉल के लिए सबसे बड़ी हैरानी वाली बात यह है कि भारतीय फुटबॉल लीग कार्यक्र्म देर रात नहीं चलता। सभी मैच 8-9 बजे तक निपट जाते हैं। दूसरी तरफ यूरोप की तमाम लीग के मुक़ाबले भारतीय समय के अनुसार रात 10-12 बजे शुरू होते हैं और सुबह तीन चार बजे तक चलते हैं।

फुटबॉल में रूचि लेने वाले भारतीय बच्चे और युवा रात भर विदेशी लीग का मज़ा लेते हैं और सुबह स्कूल, कॉलेज, बस, मेट्रो, होटल और यहां तक कि विधान सभा और बड़े सदन में भी मेसी, नेमार, रोनाल्डो, सौरेज, ग्रीज़मैन, लियोन्देवास्की और दर्जनों अन्य खिलाड़ियों की कलाकारी के चर्चे होते हैं। रियाल मेड्रिड, बार्सिलोना, सिटी , बायरन म्यूनिख, डॉर्टमांड, एरोमा, एथलेटिको, जुवेन्टस जैसे नामी क्लबों का नाम हर किसी की ज़ुबान पर होता है। लेकिन कोई भी भारतीय क्लबों और खिलाड़ियों की बात करना पसंद नहीं करता। भारतीय फुटबॉल के साथ ऐसा बर्ताव इसलिए हो रहा है। क्योंकि हमारी फुटबॉल बहुत पीछे छूट गई है। हमारे युवा और तमाम आयुवर्गों की पसंद बहुत एडवांस है। कोई भी पीछे मूड कर नहीं देखना चाहता।

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(राजेंद्र सजवान)

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