कूटनीति और ‘मोदी फैक्टर’ से ज्यादा परेशान है चीन : US एक्सपर्ट


वाशिंगटन : डोकलाम विवाद के लंबा खिंचने को भारतीय मीडिया में देश की रणनीतिक बढ़त के रूप में देखा जा रहा है। अब अमेरिकी एक्‍सपर्ट ने भी माना है कि भारत के साथ तनाव मोल लेकर चीन को कोई फायदा नहीं हो रहा है, साथ ही चीन इलाके में भारत की कूटनीति और ‘मोदी फैक्टर’ से ज्‍यादा परेशान है. चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो भारतीय हितों के लिए खड़े रहने और क्षेत्र में चीन को रोकने के इच्छुक देशों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। उक्त विचार एक शीर्ष अमेरिकी चीनी विशेषज्ञ के हैं।

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सेन्टर फोर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) की बोनी एस ग्लेसर ने कहा, “मेरा मानना है कि शी चिनफिंग प्रधानमंत्री मोदी को एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो भारतीय हितों के लिए खड़े रहना और क्षेत्र में चीन को रोकने के इच्छुक अन्य देशों, खासतौर से अमेरिका और जापान के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं, और मुझे लगता है इसी बात से चीन चिंतित है।”

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एशिया के लिए वरिष्ठ सलाहकार और वाशिंगटन डीसी स्थित शीर्ष अमेरिकी थिंक टैंक सीएसआईएस में चाइना पावर प्रोजेक्ट की निदेशक ग्लेसर का मानना है कि चीन को भारत के साथ अपने तनावपूर्ण संबंधों से कुछ लाभ होता नजर नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा, “शुरुआत में शी चिनफिंग दिल्ली गए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से रिश्ते कायम करने की कोशिश की। मुझे लगता है कि उन्हें उम्मीद थी कि भारत ऐसी नीति अपनाएगा जो चीनी हितों को चुनौती नहीं देगी। लेकिन दक्षिण चीन सागर में उनकी गतिविधियां जारी रहने के कारण ऐसा नहीं हो पाया।”

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डोकलाम में घटनाक्रमों पर करीबी नजर रख रही ग्लेसर ने कहा, “हिंद महासागर और अन्य समुद्री क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच जाहिर तौर पर मतभेद हैं। चीन को भारत के साथ अपने तनावपूर्ण संबंधों से लाभ होता नहीं दिख रहा है। आखिरकार दोनों देशों के बीच लंबी साझा सीमा है। “

गौरतलब है कि चीन ने भारत-भूटान-चीन सीमा के समीप सड़क निर्माण शुरू किया था जिसका निर्माण कार्य भारतीय सेना ने रूकवा दिया था। इसके बाद 16 जून से ही डोकलाम में भारत और चीन के बीच गतिरोध बना हुआ है। ग्लेसर ने कहा कि चीन लंबे समय में अपने लिए भारत को एक मुख्य चुनौती मानता है।

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उन्होंने कहा, “चीन भारत को सबसे बड़ी उभरती शक्ति के रूप में देखता है जो, दीर्घावधि  में उसके लिए चुनौतियां पैदा कर सकता है। आने वाले समय में चीन क्षेत्र में उसकी बढ़ती शक्ति को चुनौती देने के लिए जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे अन्य देशों के साथ भारत के सहयोग को लेकर चिंतित है, यह नकारात्मक है।”

उन्होंने कहा कि दुनिया में भारत ही इकलौता देश है जो चीन के वन वेल्ट एंड वन रोड पहल का स्पष्ट रूप से विरोध करता है। उन्होंने कहा, “चीन यह नहीं मानता कि भारत से उसे कोई खास सैन्य खतरा है। उदाहरण के लिए चीन अपनी सुरक्षा के लिए भारत के परमाणु शस्त्रों को बड़ा खतरा नहीं मानता है लेकिन भारत को राजनीतिक खतरे के रूप में देखता है क्योंकि उसका चीन को रोकने के लिए अन्य शक्तियों के साथ सहयोग है।”

विशेषज्ञ ने कहा कि अगर डोकलाम गतिरोध जारी रहता है तो भारत का रुख और उसके नतीजों का क्षेत्र में अन्य देशों पर बड़ा असर पड़ सकता है खासतौर से उन देशों पर जिनका चीन के साथ सीमा विवाद है। ग्लेसर ने कहा, “अगर चीन जीत जाता है या दूसरे शब्दों में भारत अपनी सेना वापस बुला लेता है तो चीन आगे बढऩे और सड़क बनाने में कामयाब हो जाएगा और आखिरकार भारत तथा भूटान को इसे स्वीकार करना पड़ेगा, वह भी यह जानते हुए कि यह उनके खासतौर से भारत के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है। “