ब्रिटेन-मॉरीशस विवाद आईसीजे में भेजने संबंधी प्रस्ताव का भारत ने किया समर्थन


संयुक्त राष्ट्र : भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के उस प्रस्ताव पर ब्रिटेन के खिलाफ मतदान किया है जिसमें ब्रिटेन एवं मॉरीशस के बीच हिंद महासागर के एक द्वीप को लेकर चल रहे दशकों पुराने के विवाद पर अंतराराष्ट्रीय न्यायालय की राय की मांग की गई है। ब्रिटेन को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस प्रस्ताव को 15 के मुकाबले 94 मतों के अंतर से पारित कर दिया। इस प्रस्ताव में हेग आधारित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से कहा गया है कि वह ‘चागोस आर्किपेलागो’ द्वीप की कानूनी स्थिति पर गौर करे।

मॉरीशस का कहना है कि यह द्वीप उसके क्षेत्र में है जिस पर ब्रिटेन 1965 से अपना दावा जताता आ रहा है। ब्रिटेन ने 1965 में यह द्वीप मॉरीशस से अलग किया और फिर 1968 में इसे आजादी दे दी। भारत उन देशों में शामिल रहा जिन्होंने मॉरीशस की ओर से पेश और अफ्रीकी देशों के समूह की ओर सह-प्रायोजित प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरूद्दीन ने इस प्रस्ताव पर कहा, “उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने के लिए प्रयास कर रहे सभी लोगों को हमारे पुराने सहयोग के तहत हम चागोस आर्किपेलागो पर अपनी संप्रुभता बहाल करने के मॉरीशस के प्रयास में निरंतर सहयोग कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि भारत इस मसौदे का समर्थन करता है और इसके पक्ष में मतदान करता है।

मतदान से पहले मॉरीशस के चागोस आर्किपेलागो मामले के रक्षा मंत्री अनिरूद्ध जगन्नाथ ने संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों से कहा कि यह द्वीप 18वीं सदी से उनके देश का हिस्सा रहा है जब फ्रांस ने इस पर शासन किया था। उन्होंने कहा कि इस पूरे क्षेत्र का 1810 में ब्रिटेन के साथ विलय कर दिया गया और नवंबर, 1965 में इसे अलग किए जाने तक इस पर कुछ नहीं किया गया था। अकबरूद्दीन ने कहा कि उपनिवेशवाद के दौर गुजर चुके एक देश के तौर पर भारत 1947 में अपनी आजादी के बाद से उपनिवेश और रंगभेद के खिलाफ संघर्ष में सबसे आगे खड़ा रहा है।

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