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बिहार में कांग्रेस कार्यकर्ता असमंजस में!

बिहार में विपक्षी दलों के महागठबंधन के प्रमुख घटक दल कांग्रेस यूं तो पिछले कई वर्षो से अंतर्कलह से परेशान है अब दूसरी समस्या कार्यकर्ताओं में असमंजस को लेकर उत्पन्न हो गई है। ऐसे में अगले साल होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर जहां सभी पार्टियां जोरशोर से तैयारी में जुटी हैं, वहीं कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यही पता नहीं कि विधानसभा चुनाव मैदान में कांग्रेस अकेले उतरेगी या गठबंधन के साथ। 

पार्टी के पूर्व अध्यक्ष  है कि फिलहाल इन नेताओं का ना तो इस्तीफा स्वीकार किया गया है और न ही ये सक्रियता के साथ पार्टी के साथ जुड़ रहे हैं। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर कहा कि बड़ी से लेकर छोटी पार्टियां जनता से जुड़ने के लिए विभिन्न कार्यक्रम बनाकर शहर से लेकर गांव तक पहुंच रही है। जनता के मुद्दों को लेकर सड़क पर पार्टी के नेता उतर रहे हैं परंतु कांग्रेस के सभी नेता पार्टी द्वारा बुलाई गई बैठक में भी नहीं जुट पा रहे हैं। 

कांग्रेस सूत्रों का मानना है कि झारखंड में नेतृत्व परिवर्तन के बाद संभावना है कि जल्द ही कांग्रेस आलाकमान की नजर बिहार की ओर पड़ेगी और संगठन के कार्यक्रमों की रूपरेख तय होगी। उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन झा द्वारा पार्टी की सलाहकार समिति की बुलाई गई, बैठक में कई वरिष्ठ नेता नदारद रहे थे। यही कारण है कि बैठक में पार्टी को मजबूत बनाने के उपाय ढूंढने से अधिक नेता इस बात पर उलझे रहे कि पार्टी को राजद के साथ तालमेल करना चाहिए या नहीं, लेकिन कोई एक राय नहीं बन पाई।

 पार्टी के वरिष्ठ नेता सदानंद सिंह जहां बिहार विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव मैदान में जाने की वकालत कर रहे हैं वहीं पार्टी के कई नेता ऐसे भी हैं जो समान विचाराधारा वाली पार्टियों के साथ गठबंधन करने की राय रखते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिंह कहते हैं कि कांग्रेस के पास नेतृत्व की कोई कमी नहीं है। कांग्रेस को बिना गठबंधन के चुनाव मैदान में उतरना चाहिए। उन्होंने कहा कि आखिर गठबंधन में चुनाव लड़ने से क्या लाभ हुआ। 243 विधानसभा सीटों में से पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 27 सीटों पर विजय हासिल की। 

कांग्रेस संगठन से जुड़े एक नेता ने कहा कि इस स्थिति में विधायकों की चिंता अगले साल होने वाले चुनाव में फिर से जीतने की है। ऐसे में ये विधायक अपने क्षेत्रों को छोड़कर बाहर नहीं निकल रहे हैं, जिस कारण संगठन का काम ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है। 

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के बाद से पार्टी का कोई भी दिग्गज नेता बिहार की धरती पर नहीं आया है, जो कार्यकर्ताओं में जोश भर सके। राहुल गांधी एक दिन के लिए पटना आए भी तो अदालती कार्य संपन्न कर वापस दिल्ली लौट गए। लोकसभा चुनाव के पूर्व शत्रुघ्न सिन्हा, उदय सिंह, तारिक अनवर जैसे कई दिग्गज नेताओं ने कांग्रेस का 'हाथ' थाम लिया, परंतु इन्हें सफलता नहीं मिली। ऐसे में कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या ऐसे नेताओं को जिम्मेदारी देने की भी है। 

कांग्रेस के प्रवक्ता हरखु झा ने माना कि कांग्रेस कठिन दौर से गुजर रही है। झा कहते हैं, "कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक अपने बहुत कठिन दौर से गुजर रही हैं, जिसमें आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इसी कोशिश में लगी हैं।"