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बिहार

डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और स्मार्ट फोन सभी फेलूअर साबित हुआ और जाति समीकरण लोगों में हावी रहा

पटना : देश और बिहार में पहली बार लोकसभा चुनाव में आमजनों के बीच चुनावी मौसम का बयार नहीं देखा गया। गरीब-गुरबा एवं सभी मजदूर तबका के लोग कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर वोट देते रहे। लेकिन उन्होंने किसी को यह नहीं बताया कि हमारा वोट किसके पक्ष में जायेगा और किसके पक्ष में नहीं। पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर बताया जाता कि समय आने पर सही नेता को वोट देंगे।

सातवां चरण एवं अंतिम चरण में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना साहिब लोकसभा में अपने गृह क्षेत्र बख्तियारपुर में वोट देने के बाद पत्रकारों से कहा कि चुनाव प्रक्रिया इतनी लम्बी नहीं होनी चाहिए। इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलायी जायेगी। मुख्यमंत्री खुद उडऩ खटोला से 45 दिनों तक चुनाव प्रचार करते रहे। एक तरफ जनता नीतीश कुमार को देखने व सुनने के लिए चिलचिलाती धूप में खड़े रहते थे तो उनके साथ मुख्यमंत्री को भी मेहनत करना पड़ता था। चुनाव प्रक्रिया 15 दिन में करे या दो महीना में इससे कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। आजादी के 70 साल बाद आज प्रत्येक पांच साल में लोकसभा और विधानसभा का चुनाव हो रहा है।

केन्द्र व राज्य सरकार से विकास मद में अरबों-खरबों रुपये आता है मगर अब भी विकास का रास्ता ग्रामीणों के दरवाजे तक क्यों नहीं पहुंची? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साढ़े चार साल में बहुत विकास किया तो उन्हें सात चरणों के चुनाव में ग्यारह बार बिहार के चुनावी सभा में भाषण क्यों करना पड़ा? सभी जगह स्वास्थ्य का ढिढ़ोरा पीटा जा रहा है मगर आज भी ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को आयुष्मान भारत योजना का कार्ड तक नहीं बना। बहुत लोग तो सदर अस्पताल से लेकर रेफरल अस्पताल और प्रखंड से लेकर पंचायत तक घुमते-घुमते थक कर बैठ जाते हैं। उनमें एक ही आशा होती है कि पैसा होगा तो इलाज करायेगे नहीं तो भगवान मालिक हैं।

कभी भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनके स्वास्थ्य मंत्री एवं आलाधिकारी ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर जानकारी लेना मुनासिब नहीं समझा। 2014 में मोदी जी डिजिटल इंडिया को लेकर लेकर आये थे उसके बाद मेक इन इंडिया और 2019 में स्मार्ट फोन द्वारा लोगों को अपने घर से वोट कर चुनाव जीत लेने की बात कही थी। जब से आंचार संहिता लागू हुआ तब से लगभग दो महीना तक न डिजिटल इंडिया, न मेक इन इडिया और न स्मार्ट फोन काम आया। वोट देने वाला गांव-गवार के लोग सारा समीकरण भूलकर जाति समीकरण पर ही लोकसभा के चुनाव में वोट दिया।

बीते दिन दशरथ मांझी गया क्षेत्र में जिन्होंने पहाड़ काटकर रास्ता बनाया अब वहां बड़े-बड़े सडक़ बना दिये गये। मांझी जी का कद और पग सजा दिया। आज भी मुसहर समाज को पानी तक भी नहीं मिला। लोग बेरोजगार हैं किसी तरह अपनी जीविका चला रहे हैं। दशरथ मांझी का सपना उसी दिन साकार होगा जब लोगों को शुद्ध पानी, शौचालय और रोजगार मिलेगा। मगर मिले तब तो। बिहार के मधेपुरा क्षेत्र जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कुछ सप्ताह रहकर पूरे बिहार में चुनाव प्रचार किये। मधेपुरा शहर में सडक़ गड्ढे में तब्दील है।

मात्र मुख्यमंत्री जिस रास्ते से एयरपोर्ट जाते हैं सिर्फ वही सडक़ ठीक है बाकी पूरा मधेपुरा का सडक़ गड्ढा में तब्दील है। जबकि बिहार सरकार को सडक़ मामले में कहा जाता है कि बिहार के किसी भी कोने से राजधानी मात्र छह घंटे में पहुंचा जा सकता है। मधेपुरा में पांच किमी सडक़ पर पहुंचने के लिए एक घंटा का समय लग जाता है।

आज भी मरीजों को अस्पताल पहुंचने में कठिनाई होती है। बेतिया में भी भाजपा के सांसद जीतकर संसद जाते हैं। यहां भी गर्वेनमेंट मेडिकल कॉलेज है और बापू के कर्मभूमि है मगर बेतिया का सडक़ भी गड्ढे में तब्दील है। जनता कहती है कि केन्द्र और राज्य सरकार एक साथ होने के बावजूद भी बेतिया में सडक़ नहीं बन रही है बेतिया के बाहर में बड़े-बड़े सडक़ दिखाई देगा मगर जहां सरकार का समाहरणालय है वहां भी सडक़ की स्थिति दयनीय है। केन्द्र में जिस किसी कि सरकार आये लेकिन जनता के मूल समस्या का जो हल करेगा उसको चुनाव जीतने के लिए इतना मेहनत नहीं करना पड़ेगा। आगे एक दिन के लिए जनता मालिक है और जनता के बिना सरकार नहीं चल सकती।