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बिहार

साहित्य सम्मेलन में संत कवि तुलसी दास की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर दी गयी श्रद्धांजलि

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पटना : महाकवि तुलसीदास काव्य संसार के एक ऐसे महापुरुष हैं, जिन्होंने भारतीय मनीषा के उस दर्शन को प्रतिपादित किया जिसमें यह कहा गया है कि कवि देव होते हैं। उन्होंने अपने विश्व ख्यात महाकाव्य रामचरित मानस के माध्यम से श्लोक नायक कवि के रूप में साहित्य संसार में प्रतिष्ठा पायी। यह बातें आज यहां संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास की जयंती पर बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा. अनिल सुलभ ने कही। 


अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के प्रधानमंत्री डा. शिववंश पाण्डेय ने कहा कि तुलसी के काव्य में हिन्दी की प्रबल शक्ति को देखा जा सकता है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में पं रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि एक तुलसी के साहित्य से ही हिन्दी की विराट शक्ति और ऊर्जा का बोध हो जाता है। सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त, प्रो. बासुकीनाथ झा, डा. कल्याणी कुसुम सिंह, डा. भूपेन्द्र कलसी, कुमार अनुपम, बच्चा ठाकुर, डा. मेहता नगेंद्र सिंह तथा डा. बी एन विश्वकर्म ने भी अपने श्रद्धा उद्गार व्यक्त किए। आरंभ में सम्मेलन के प्रथम तल पर स्थापित महाकवि की संगमरमर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी गई। इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी वंदना से हुआ।


वरिष्ठ कवि डा. शंकर प्रसाद ने अपनी गजल का सस्वर पाठ करते हुए कहा कि नयन में आज फिर लहरा गए बादल, पताका दर्द की फहरा गए बादल, कलेजा चीर के जो रख दिया करती, सुनो उस पीर को गहरा गए बादल।वरिष्ठ कवि राज कुमार प्रेमी, बच्चा ठाकुर, आचार्य आनंद किशोर शास्त्री, पं. गणेश झाएरीता सिंह, राहुल राज, नवल किशोर शर्मा, डा. विनय कुमार विष्णुपुरी, सच्चिदानंद सिन्हा, राज किशोर झा, बांके बिहारी साव,  नेहाल कुमार सिंह निर्मल, अर्जुन प्रसाद सिंह, मुकेश कुमार ओझा आदि कवियों ने भी अपनी रचनाओं का पाठ किया। मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद ज्ञापन आनंद किशोर मिश्र ने किया।