इंदौर : नीति आयोग ने कहा कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में खनन क्षेत्र की हिस्सेदारी को मौजूदा 1.4 प्रतिशत से बढ़ाकर सात-आठ प्रतिशत तक ले जाने की जरूरत है, ताकि विकास की ऊंची छलांग लगाने के लिये क्षेत्र का पर्याप्त दोहन किया जा सके। नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ कांत ने यहां चौथे राष्ट्रीय खान और खनिज सम्मेलन में कहा कि हमारे जीडीपी में फिलहाल खनन क्षेत्र की हिस्सेदारी केवल 1.4 प्रतिशत है, जबकि इस क्षेत्र के विस्तार की सबसे ज्यादा संभावनाएं हैं। हमें खनन क्षेत्र के पर्याप्त दोहन से इस भागीदारी को बढ़ाकर सात-आठ प्रतिशत करने की जरूरत है।

नीति आयोग के सीईओ ने कहा कि देश की जीडीपी वृद्धि दर की करीब 7.5 प्रतिशत के मौजूदा स्तर से ऊंची छलांग के लिये ‘मेक इन इंडिया’ की अवधारणा को मूर्त रूप दिया जाना जरूरी है। ‘मेक इन इंडिया’ की अवधारणा ‘माइन इन इंडिया’ की परिकल्पना को साकार रूप दिये बगैर अमल में नहीं आ सकती है। देश में खनिजों की खोज और इन्हें जमीन से निकालने की गतिविधियों में तेजी की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इस सिलसिले में हम जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, अगर उसी रफ्तार से आगे बढ़ते रहे तो नीति आयोग के अनुमान के मुताबिक हमें अपनी मौजूदा खनिज संपदा के दोहन में 600 साल और लगेंगे।

कांत ने कहा कि अगर खनन क्षेत्र को तेज रफ्तार से बढ़ावा दिया जाये तो देश में वर्ष 2025 तक 60 लाख अतिरिक्त रोजगार पैदा हो सकते हैं। खनन गतिविधियों के विस्तार के लिये तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और उड़ीसा समेत 10 सूबों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये। उन्होंने सुझाया कि खनिजों की खोज और खनन पट्टा की सरकारी अनुमतियां एक साथ दी जानी चाहिये। किसी इकाई को खनन का टेंडर मिलने के बाद या तो उसे तीन महीने के अंदर तमाम मंजूरियां अनिवार्य तौर पर मिलनी चाहिये या खनन संबंधित अधिकांश अनुमतियां बोली प्रक्रिया के पहले ही दे दी जानी चाहिये।

कान्त ने कहा कि वर्ष 1957 का खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम (एमएमडीआर एक्ट) बहुत पुराना हो चुका है। इस अधिनियम पर दोबारा विचार की जरूरत है, ताकि खनन क्षेत्र के नियम-कायदों को आसान बनाया जा सके। कान्त ने कहा कि न्यायपालिका के मन-मस्तिष्क से यह बात हटानी बेहद जरूरी है कि खनन गतिविधियों से पर्यावरण बर्बाद होता है। इसके लिये अत्याधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से खनन किया जाना चाहिये, ताकि पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।