कृषि कर्ज माफी से बढ़ सकता है महंगाई का खतरा


Urjit-Patel

नई दिल्ली : कर्ज माफी आज के दौर का सबसे अहम मुद्दा बन गया है। जैसा की हम रोज़ देख व सुन रहे है आज यहां कोई किसान गोली मारी में मारा गया या किसी किसान ने आत्महत्या कर ली। ऐसे में बेचारी सरकार भी क्या करे ? किसानों के देशव्यापी असंतोष से निबटने के लिए यदि राज्य सरकारें कृषि कर्ज माफी का रास्ता चुनती हैं तो सरकारी खजाने पर तीन लाख दस हजार करोड़ रूपए का अतिरिक्त बोझ आएगा तथा सेठ साहूकारों से कर्ज लेने वाले देश के दो करोड़ 21 लाख सीमांत किसानों को इसका कोई फायदा नहीं मिलेगा।

सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र से जुडे मुद्दों का अध्ययन करने वाली गैर सरकारी संस्था ‘इंडियास्पेंड’ की ताजा रिपोर्ट में यह बात कही गई है। इसके अनुसार उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सरकारों के क्रमश 36359 करोड़ और 30 हजार करोड़ रूपए की कर्ज माफी घोषणा के साथ ही पंजाब और कर्नाटक में भी किसानों ने कर्ज माफी की मांग तेज कर दी है। सरकारें अगर इस मांग को मान लेती हैं तो भी किसानों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल किसान आबादी का 67.5 प्रतिशत छोटे सीमांत किसान है जिन्हें कर्ज माफी से कोई फायदा मिलने की उम्मीद नहीं है। देश की खेतिहर जमीन में से 85 फीसदी खेतों की जोत दो हेक्टेयर से भी कम है। कृषि मंत्रालय के आंकडों के अनुसार वर्ष 1951 के बाद से गांवों में प्रति व्यक्ति भूमि स्वामित्व में लगातार कमी आई है। आगे इसके और घटने के आसार हैं। इन छोटे-छोटे खेतों में काम करने वाले किसानों की आर्थिक स्थिति इतनी बदहाल है कि वह खेती के लिए नए उपकरण नहीं खरीद पाते। उन्हें खेतों में श्रमिकों से ही काम चलाना पड़ता है।

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इससे एक तो उत्पादन घटता है, दूसरा लागत ज्यादा आती है और मुनाफा भी कम होता है। इन छोटे किसानों के लिए संस्थागत कर्ज हासिल करने के अवसर सीमित रह जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश में हर तीन में से एक सीमांत किसान ही संस्थागत कर्ज हासिल कर पाता है। लिहाजा बाकी को कर्ज के लिए साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में जिन 8 राज्यों में कृषि कर्ज माफी की मांग उठी हैं वहां केवल एक करोड छह लाख सीमांत किसान ही लाभान्वित होंगे बाकी इससे वंचित रह जाएंगे। रिपोर्ट के अनुसार यदि कर्ज माफी की मौजूदा मांग पूरी की गई तो सरकारी खजाने पर कुल तीन लाख दस हजार करोड़ रूपए का अतिरिक्त बोझ आ जाएगा।

पहले से ही पूंजी संकट से जूझ रहे सार्वजनिक बैंकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। किसानों के कर्ज माफी के चलन पर गहरी चिंता जताते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल पहले ही कह चुके हैं कि इससे वित्तीय घाटा और महंगाई में वृद्धि का खतरा बढ़ जाएगा। उनका कहना है कि जब तक राज्यों के बजट में वित्तीय घाटा सहने की क्षमता नहीं आ जाती, तब तक उन्हें किसानों के कर्ज माफ करने से बचना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार यह आम धारणा भी सही नहीं है कि कर्ज माफ होने से किसान आत्महत्या करना बंद कर देंगे।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2007 में देशभर में कुल 16,379 किसानों ने आत्महत्या की थी जिसमें से महाराष्ट्र के 27 फीसदी किसान थे। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की 2009 में कृषि कर्ज माफी घोषणा के बाद इन मामलों में गिरावट आई लेकिन साल 2015 में ये 34 फीसदी पर पहुंच गई। तेलंगाना का भी यही हाल रहा। साल 2014 में राज्य सरकार ने 17 हजार करोड़ रूपए का कृषि कर्ज माफ करने की घोषणा की थी इसके बावजूद राज्य में 1347 किसानों ने आत्महत्या की।

यह संख्या 2015 में बढ़कर 1400 पर पहुंच गई। रिपोर्ट के अनुसार किसान की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ कर्ज नहीं है। अधिक उत्पादन, उत्पादों का उचित मूल्य न मिल पाना , भंडारण और मंडियों तक पहुंच की पर्याप्त सुविधाओं का अभाव, बाजार के जोखिम और वैकल्पिक आजीविका का न होना भी इसके बड़े कारण हैं जिनके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर प्रभावी नीति बनाने की दरकार है।