इंसाफ मांगने नाबालिग बच्ची पहुंची दिल्ली


नई दिल्ली: तेरह साल की आदिवासी परिवार की मासूम बच्ची के साथ उसी के गांव के दूसरे समुदाय के लोगों ने दुष्कर्म किया। इस घटना की शिकायत गोसाबा पुलिस स्टेशन में दर्ज है लेकिन आज तक इस बच्ची को इंसाफ नहीं मिला। यहां तक की बच्ची आदिवासी परिवार से होने के बाद भी आरोपियों पर अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज नहीं किया गया। आरोपी जमानत पर हैं। पिछले महीने की 9 तारीख को बच्ची और उसके परिवार को सपोर्ट करने वाले परिवार के साथ भी बुरी तरह मारपीट की गई। उनका पूरा घर तोड़ दिया गया। पश्चिमी बंगाल के मानवाधिकार रक्षा मंच संगठन के संयोजक पार्थव बिश्वास के साथ बच्ची और गुंडों से डरा दूसरा परिवार दिल्ली में इंसाफ की आस में पहुंचा है। 24 परगना बटतोली गांव के रहने वाले शांतिराम मुंडा आदिवासी समुदाय हैं। उनके गांव में उनकी जनजाति के 45 परिवार हैं। जबकि बंगलादेश से आए दूसरे समुदाय के लोगों के यहां पर 250 परिवार हैं।

पेशे से राजमिस्त्री का काम करने वाले शांतिराम मुंडा साल में कुछ ही महीने अपने गांव में रहते हैं। बाकी समय वह केरल में काम करते हैं। मुंडा ने बताया कि 2013 में उन्हीं के समुदाय की एक बच्ची के साथ गांव के कुछ लोगों ने गैंगरेप किया था। बाद में उसी बच्ची के परिजनों के साथ मिलकर उन्होंने संबंधित थाने में शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप है कि पुलिस ने रेप की धाराओं में मामला ही नहीं दर्ज किया। यहां तक कि अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धाराएं भी नहीं लगाई। आरोपियों को जमानत मिल गई। चार साल से उनके परिवार को धमकियां मिल रही हैं। मुंडा ने बताया 9 जुलाई को उनके घर में पूर्णिमा की पूजा था। यह उनके समुदाय का बहुत बड़ा त्योहार है।

तभी गांव के दूसरे समुदाय के 15 से 20 लोग उनके घर में आए और लाठी-डंडो से ताबड़तोड़ उनकी पिटाई। बीच बचाव करने आई उनकी पत्नी को बुरी तरह पीटा गया। शांतिराम कहते हैं कि अब शायद जीवनभर उनका हाथ सीधा नहीं होगा। मानवाधिकार रक्षा मंच के संयोजक पार्थ बिश्वास का कहना है कि दक्षिणी 24 परगना के इस क्षेत्र में एक नहीं सैंकड़ों परिवार दहशत के साए में जी रहे हैं। आए दिन बच्चियों के साथ बलात्कार जैसी घटनाएं होती हैं लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं थी। 2007 से पहले तक स्थिति कुछ ठीक थी लेकिन अब हालात खराब हो गए हैं। लोगों के पास अपने घर छोड़कर कहीं और पलायन करने के लिए कोई विकल्प नहीं बचा है।

– आदित्य भारद्वाज