इन हालातों से गुजर रहा है ‘देश का भविष्य’


नई दिल्ली: ‘यह बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं। यह हमारे देश की शान हैं। इन्हीं के कंधों पर आने वाले भारत की जिम्मेदारी है। इनमें से कोई डॉक्टर तो कोई बड़ा अधिकारी बनकर देश और अपने मां-बाप का गौरव बढ़ाएगा।’ यह बातें हमें आमतौर पर किसी कार्यक्रम या अन्य जगहों पर राजनेताओं के मुंह से सुनने को मिल जाती हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के वादे करने वाले नेता शायद इनकी इस हालात से अंजान हैं कि यह बच्चे स्कूलों में फटे जूते और गंदी ड्रेस पहनकर जाने को मजबूर हैं। कई बच्चे तो ऐसे हैं जो बिना यूनीफॉर्म के ही स्कूल में पढऩे जाते हैं, लेकिन न तो शिक्षक ही उन्हें इसका कारण पूछते हैं और न ही प्रिंसिपल इसे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। इसके अलावा मां-बाप की बात करें तो वह इतने सक्षम नहीं है कि अपने बच्चों को नए जूते या स्कूल ड्रेस दिला सकें। इन हालातों को देखते हुए कहा जा सकता है कि हमारे देश का भविष्य गरीबी और लापरवाही के बीच मुर्झाकर रह गया है।

खेल खत्म तो चल दिए स्कूल…


आलम यह है कि यह बच्चे सुबह तो जी भरकर खेलते हैं और जैसे ही स्कूल का समय होता है तुरंत बैग उठाकर स्कूल की ओर चल देेते हैं। यहां तक कि कई बार यह बच्चे बिना नहाय, खाना खाए ही स्कूल पहुंच जाते हैं। इन बुरी आदतों से न तो मां-बाप बच्चों को रोकते हैं और न ही शिक्षक। यह छोटे-छोटे बच्चे तो स्कूलों में भी इसी तरह मिट्टी से दो चार होते नजर आते हैं। इनकी मासूमियत और दूसरों की लापरवाही इन्हें कई तरह के नुकसान भी पहुंचा सकती है।

समय पर नहीं मिलते वर्दी के पैसे
बच्चों को सभी प्रकार की सुविधा देने के वादे तो समय-समय पर किए जाते हैं, लेकिन एमसीडी के स्कूलों में पढ़ रहे इन बच्चों को न तो समय पर पैसे मिलते हैं और न ही किताबें। माता-पिता आर्थिक रूप से इतने मजबूत नहीं होते कि वह अपने बच्चों को स्कूली ड्रेस दिलवा सकें। धूप हो या छांव, बारिश हो या तूफान यह बच्चे फटे जूतों, सेंडल और चप्पलों में ही स्कूल पहुंच जाते हैं। साथ ही ड्रेस न हो तो बच्चे घरों के कपड़ों में ही बैग उठाकर स्कूल की ओर चल देते हैं।

स्कूलों की हालत भी है खस्ता
एमसीडी के स्कूलों में पढऩे वाले केवल बच्चों की ही नहीं बल्कि एमसीडी के स्कूलों की हालत भी काफी खस्ता है। स्कूलों में चारों तरफ उड़ती मिट्टी के बीच बच्चे पढऩे को और शिक्षक पढ़ाने को आदि हो चुके हैं। इन स्कूलों की सुध न तो प्रशासन लेता है और न ही कोई स्कूलों की स्थिति सुधारने के प्रयास करता है। अब ऐसे में यह देश का भविष्य उस दौर से गुजर रहा है, जिससे शायद कोई गुजरना पसंद न करें।

– सिमरनजीत सिंह