राजनैतिक दल और जनप्रतिनिधि भले ही जिले में विकास के बड़े-बड़े दावे करते हों, लेकिन रोजगार की कोई व्यवस्था न होने से जिले के 24 फीसदी लोग सिर्फ मजदूरी पर ही निर्भर हैं। वहीं मनरेगा श्रमिकों और मुख्यमंत्री मजदूर सुरक्षा योजना में पंजीकृत मजदूरों को शामिल करें तो जिले में मजदूरों की संख्या 32 फीसदी है।

इसी बीच एक हैरान करने वाला आंकड़ा सामने आया है। श्रमिक कल्याण योजनाओं को और बेहतर बनाने के लिए एक मीटिंग की गई जिसके बाद पता चला कि प्रदेश में तकरीबन 2 करोड़ लोग ऐसे हैं जो मजदूरी करते हैं।

यह आंकड़ा 2011 की जनगणना के अनुसार बताया गया है। यानि प्रदेश की 25 फीसदी आबादी ऐसी है जो मजदूरी के काम में लगी हुई है। सरकार द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों के बीच ये संख्या हैरान करने वाली है। बता दें कि राज्य में सबसे ज्यादा कृषि पर आश्रित लोग हैं। यहां असंगठित क्षेत्र के तहत करीब 1.85 करोड़ मजदूर खुद को श्रमिकों की श्रेणी में पंजीकृत है।

इस पर मध्यप्रदेश के श्रम मंत्री बालकृष्ण पाटीदार का कहना है कि सरकार लिस्ट को अपडेट करवाएगी। उन्होंने बताया कि जिन किसानों के पास 2.50 एकड़ से कम भूमि है उन्हें भी मजदूरों की श्रेणी में रखा गया है। वहीं जो लोग इनकम टैक्स भर रहे हैं या पेंशन ले रहे हैं उनकी भी लिस्ट दोबारा जांच के बाद जारी की जाएगी। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में मजदूरों की संख्या में कमी आ सकती है।

वही ,कांग्रेस को लगता है कि ये आंकड़े एक बड़े घोटाले की तरफ इशारा कर रहे हैं. कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता के के मिश्रा ने कहा, ‘1 मई को मजदूर दिवस है. देखते हैं उस दिन 2 करोड़ की फौज इकट्ठा कर पाएगी फर्जी नामों से विधवा, विकलांगों की पेंशन खाई गई है, वैसा ही बड़ा घोटाला मजदूरों के नाम पर हो रहा है।

डेढ़ दशक से मध्यप्रदेश की सत्ता पर बीजेपी काबिज है। इस दौरान राज्य महिला अपराध, कुपोषण से मौत में अव्वल रहा। अब 7 करोड़ में 2 करोड़ की आबादी ने बतौर मजदूर आवेदन दिया है। वो राज्य जो मनरेगा के तहत सबसे कम मज़दूरी देने वाले राज्यों में शुमार है।

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