बच्चों, महिलाओं के लिए संवेदनशील अदालतें जरूरी


भोपाल: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश मदन बी लोकुर ने मध्यप्रदेश में जरूरतमंद बच्चों के कल्याण और उत्थान की खातिर गवाहों और पीडि़तों के लिए अतिसंवेदनशील न्यायालयों की स्थापना पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाओं में बेहतरी की भी आवश्यकता है।

यूनिसेफ द्वारा किशोर न्याय पर आयोजित सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उच्चतम न्यायालय की किशोर न्याय समिति के चेयरमेन जस्टिस लोकुर ने कहा कि बच्चों के लिये बुनियादी सुविधाओं को बेहतर और मजबूत करने की जरूरत है। बच्चों की कल्याण समितियों, केन्द्रों और संस्थाओं के लिये मानव संसाधन की भी आवश्यकता है। देश की आबादी 125 करोड़ है, लेकिन बच्चों के कल्याण लिये मानव संसाधन की कमी है।

इन केन्द्रों के लिये नये पद सृजित किये जाने चाहिये। उन्होंने सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों के हवाले से कहा कि इन केन्द्रों के लिये समय पर धन भी जारी नहीं किया जाता है। उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ‘उन्हें बच्चों के लिये इन तीन बातों का ध्यान रखना चाहिये। यदि वह (मुख्यमंत्री) ऐसा करते हैं तो यह काफी सहायक होगा। जस्टिस लोकुर ने कहा, महिलाओं, बालिकाओं के खिलाफ पोस्को एक्ट के तहत यौन अपराध के मामले अदालतों में बड़ी संख्या में हैं। इसलिये हमें गवाह और पीडि़तों के लिये संवेदनशील अदालतों की जरूरत है। उन्होंने कहा, ‘आप कल्पना कर सकते हैं कि एक पीडि़त महिला की क्या स्थिति होती होगी जब दो-तीन माह पहले ही उससे बलात्कार करने वाला व्यक्ति अदालत में उसके सामने खड़ा होता है।

ऐसी ही स्थिति 8-10 साल के पीडित बच्चे के साथ भी होती है।’ उन्होंने कहा कि इसलिये गवाह या पीडि़त जब बच्चा या महिला हो तो उसकी रक्षा करने की आवश्यकता है। इसलिये हमें इनके प्रति अति संवेदनशील अदालतों की जरूरत है इस तरह की एक अदालत की स्थापना पर लगभग 10 लाख रुपये का व्यय होगा। कुछ राज्यों में इस प्रकार की अदालत शुरू हो गयी हैं। अपने संबोधन में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हेमंत गुप्ता, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बच्चों को देश का आदर्श नागरिक बनाने के लिए शिक्षित करने की जरूरत पर जोर दिया।