भाजपा ने की हमसे कृषि कर्ज माफी का श्रेय छीनने की कोशिश : शिवसेना


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शिवसेना ने अपने सहयोगी दल भाजपा पर आरोप लगते हुए कहा कि वह उसने महाराष्ट्र में कृषि कर्ज माफी के फैसले का श्रेय शिवसेना से छीनने की कोशिश की है। शिवसेना ने यह भी कहा कि ‘श्रेय छीनना’ अब राजनीतिक विचारधारा का हिस्सा बन गया है। शिवसेना बहुत बार किसानों के मुद्दे पर भाजपा को निशाना साध चुकी है। उसने सरकार से किसानों का कर्ज माफ करने की अपील की थी।

पिछले महीने महाराष्ट्र में किसानों ने कर्ज माफी समेत विभिन्न मांगों को पुरजोर तरीके से उठाने के लिए अभियान छेड़ा हुआ था। इसके बाद में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किसानों के 30 जून 2016 तक के लंबित कर्ज माफ करने की घोषणा की थी। शिवसेना ने पार्टी मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में कहा कि “आज नफा और नुकसान को ध्यान में रखकर राजनीति खेली जाती है। लोगों को उलझाने के लिए योजनाएं लाई जाती हैं।

इस बात पर शोध करने की जरूरत है कि ‘ गरीबी हटाओ’ (योजना) या ‘अच्छे दिन’ का क्या हुआ?”ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान ‘अच्छे दिन’ के नारे का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर किया था। शिवसेना ने कहा, “कर्ज माफी के लिए लड़ाई किसने लड़ी और फैसले का श्रेय लेते हुए पूरे पन्ने के विज्ञापन का मजा कौन ले रहा है? श्रेय छीनना और लूटना आज राजनीतिक विचारधारा का हिस्सा बन गया है।”

शिवसेना ने कहा कि श्रेय लेने की मारामारी के बावजूद जनता सच से वाकिफ है और यह राहत की बात है। शिवसेना ने हाल ही में कहा था कि कर्ज माफी का फैसला महाराष्ट्र सरकार पर लगातार दबाव बनाए जाने के कारण लिया गया और हमने आलसी व्यक्ति की कुर्सियां हिलाने के लिए सथा में बने रहने का फैसला किया है। पार्टी ने मुख्यमंत्री से ‘जुंका भाकर केंद्र’ योजना को भी पुनर्जीवित करने के लिए कहा है। यह योजना 90 के दशक में राज्य में शिवसेना-भाजपा की सरकार के दौरान शुरू की गई थी ताकि गरीबों को एक रूपए पर पारंपरिक भोजन उपलब्ध करवाया जा सके।

शिवसेना ने कहा , “तुम चाहो तो इसका भी श्रेय ले लो, लेकिन कम से कम लोगों को इस योजना से लाभांवित तो होने दो।” पिछली कांग्रेस-राकांपा सरकार के दौरान इस योजना को बंद कर दिया गया था। यह योजना लोगों को जुंका, बेसन और पानी से बना महाराष्ट्र का व्यंजन और चावल के आटे या बाजरे से बनी चपाती उपलब्ध करवाने से जुड़ी थी। यह योजना राज्य भर में ‘बेरोजगारों’ को स्टॉल आवंटित करके राज्य की सामाजिक आर्थिक समस्या सुलझाने के लिए लाई गई थी। हालांकि बाद में ये स्टॉल व्यवसायिक गतिविधियो के लिए कब्जा लिए गए थे।