महाराष्ट्र में सीएम के गले की हड्डी बना किसान आंदोलन


किसानों के बहाने शिवसेना ने साधा केन्द्र पर निशाना

मुंबई, (रामकिशोर त्रिवेदी): महाराष्ट्र में किसानों के उग्र होते जा रहे आंदोलन के चलते भाजपा सरकार संकट में आ गई है। आंदोलन की गूंज अब दिल्ली तक जा पहुंची है जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चिंता में आ गए हैं और उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को स्थिति पर कड़ी नजर बनाए रखने का निर्देश दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि अब प्रदेश सरकार को अपने ही विधायकों और सांसदों के घरों की सुरक्षा बढ़ानी पड़ रही है। यह आंदोलन अब सीधा आम आदमी को प्रभावित करने लगा है।

मुंबई में दूध और सब्जियों की आपूर्ति में बाधाएं तो खड़ी हो ही रही हैं, इनकी कीमतों में भी काफी उछाल आ गया है जिससे अब किसान ही नहीं, आम आदमी भी खून के आंसू रोने लगा है जिसके चलते राज्य सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। किसान आंदोलन के प्रति भाजपा के सख्त तेवरों को देख अब शिवसेना भी उससे दूरी बनाने लगी है जिसका नजारा बुधवार देवेंद्र फडणवीस की अपने निवास पर की गई आपात बैठक में देखने को मिला, जहां शिवसेना नदारद थी। इससे साफ हो जाता है कि शिवसेना अब भाजपा के साथ नहीं, बल्कि किसानों के आंदोलन में उनके साथ खड़ी है।

उधर, शिवसेना के राजस्व मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने मुख्यमंत्री से यह साफ कह दिया था कि उद्धव ठाकरे मुंबई में न होने के कारण उनकी गैर-मौजूदगी में शिवसेना बैठक में भाग नहीं लेगी। अब सवाल यह उठता है कि सरकार ने अपने जनप्रतिनिधियों को तो सुरक्षा दे दी, लेकिन आम आदमी तक उनकी जरूरतें क्यों नहीं सुरक्षित पहुंच पा रहीं। उन्हें महंगे दामों पर सब्जियां खरीदनी पड़ रही हैं। इसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाए, आंदोलन की आग में घी डालने वाले कथित नेताओं को या आंदोलनरत किसानों को, जो आंदोलन को हिंसक बनाकर गरीबों तक सब्जियां नहीं पहुंचने दे रहे हैं। शिवसेना ने कहा है कि नोटबंदी ने कर्ज तले दबे किसानों को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया।

कृषि क्षेत्र के प्रति सरकार की उदासीनता पर भी पार्टी ने सवाल उठाए, जबकि उद्योग व सेवा क्षेत्र के विकास के लिए उन्हें समय-समय पर प्रोत्साहित किया गया। पिछले वर्ष मानसून ने किसानों में उम्मीद जगाई। भारी मात्रा में उत्पादन हुआ, मगर नोटबंदी के कारण बेहद सस्ती दरों पर उन्हें बेचना पड़ा। यहां तक कि वे अपनी खर्च लागत भी नहीं निकाल पाए और परिणामस्वरूप कर्ज तले दबे किसानों को और भी नुकसान हो गया।

शिवसेना ने आगे यह भी कहा कि सरकार कृषि क्षेत्र में विकास के वादे के साथ सत्ता में आई थी, मगर आज यह इस क्षेत्र में कर लगाने की धमकी दे रही है। किसानों की भावनाओं को समझने के लिए यह समझने की जरूरत है कि वे महज वोट बैंक नहीं हैं। शिवसेना यह भी जानना चाहती है कि क्यों बीजेपी कर्ज माफी से बच रही है, जबकि वह चुनावों में करोड़ों रुपये खर्च कर चुकी है जिसका जवाब जनता को दिया जाना जरूरी है।