प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू को महाभियोग प्रस्ताव का नोटिए देने के बाद कांग्रेस ने आज कहा कि उसके इस कदम के पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है तथा इसका न्यायाधीश बी एच लोया मामले में कल सुनाये गये फैसले और रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में हो रही सुनवाई से कोई संबंध नहीं है।

सभपति को महाभियोग चलाने के प्रस्ताव का नोटिस देने के बाद कपिल सिब्बल ने कहा, ‘‘प्रधान न्यायाधीश के पद की एक मर्यादा होती है। इस पद का हम सम्मान करते हैं, लेकिन खुद प्रधान न्यायाधीश को भी इसका सम्मान करना चाहिए। हमें विश्वास था कि चार न्यायाधीशों ने जो सवाल खड़े किए थे उनका समाधान होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।’’

यह भी संयोग ही है कि मई 1993 में जब पहली बार उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति वी रामास्वामी पर महाभियोग चलाया गया था तो वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में कपिल सिब्बल ने ही लोकसभा में बनाई गयी विशेष बार से उनका बचाव किया था। कांग्र्रेस और उसके सहयोगी दलों द्वारा मतदान से अनुपस्थित रहने की वजह से यह प्रस्ताव गिर गया था।

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बी. एच. लोया की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु की जांच के लिये दायर याचिकायें खारिज किये जाने के अगले ही दिन महाभियोग का नोटिस दिया गया है। लोया सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवई कर रहे थे। शीर्ष अदालत की प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कल यह फैसला सुनाया था।

यह पूछे जाने पर कि क्या महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने के कदम का लोया मामले से कोई संबंध है तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि इस मामले में फैसला कल आया है, जबकि महाभियोग प्रस्ताव से जुड़ी प्रक्रिया करीब एक महीने से चल रही थी।

यह सवाल किया गया कि क्या इसका अयोध्या मामले से लेकर चल रही सुनवाई से है तो कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा, ‘नहीं।’  दरअसल, प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली विशेष खंडपीठ अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले की सुनवाई कर रही है। इस मामले में जब शीर्ष अदालत में सुनवाई शुरू हुई थी तो कुछ पक्षकारों के वकीलों ने इसकी सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद कराने का अनुरोध किया था जिसे न्यायालय ने ठुकरा दिया था।

सिब्बल ने कहा कि महाभियोग प्रस्ताव किसी मामले के फैसले या सुनवाई को लेकर नहीं लाया जाता, बल्कि इसका संबंध न्यायाधीश के ‘दुर्व्यवहार’ से होता है।

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