वामपंथ के गढ़ में भाजपा की राह नहीं आसान


अगरतला:वामपंथ के गढ़ त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में संगठनात्मक विस्तार कर अपनी स्थिति सुधारने में जुटी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को यह अच्छी तरह एहसास है कि इन दोनों राज्यों में मतदाताओं के दिल में जगह बनाने के लिये उसे कठोर परिश्रम करना पडेगा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ काम करने वाले एक करीबी नेता ने कहा,’हम यह नहीं कहते हैं कि हमने वैचारिक बदलाव लाना शुरू कर दिया है, लेकिन पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भाजपा के मतों में धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी हो रही है। ‘

उन्होंने माना कि असम और ओडिशा के विपरीत पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के न केवल बंगाली बल्कि अन्य मतदाता वैचारिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक रुप से अभी वामपंथी हैं जो भाजपा के लिये एक बड़ी कठिनाई है। इसे ध्यान में रखकर पार्टी के रणनीतिकार मतदाताओं का दिल जीतने के लिये कुछ अलग रणनीति तैयार की है। त्रिपुरा के बंगाली बहुल इलाकों में बहुत सोचा समझा प्रचार का तरीका अपनाया गया है जहां पर ङ्क्षहदुत्व का नारा कुछ हद तक स्वीकार्य लगता है।

भाजपा की नजर ऊंची जाति के बंगालियों खासकर उन परिवारों पर है, जिनके परिजन 1947 में देश के बंटवारे के बाद बंगलादेश छोड़ कर पश्चिम बंगाल आये। भाजपा नेताओं को लगता है कि मुस्लिम विरोध और हिंदुत्व की बात करके त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को प्रभावित नहीं किया जा सकता है। यहीं कारण है कि इन राज्यों में भाजपा नेता रोजगार, महिला सशक्तिकरण और औद्योगिकीकरण के बारे में अधिक बातें कर रहे हैं।

भाजपा के नेता परितोष पाल का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को अहसास हो गया था कि बंगाल में वामदलों को दक्षिणपंथी मंच के माध्यम से नहीं हराया जा सकता इसीलिये तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाख कोशिशों के बावजूद सुश्री ममता बनर्जी ने भाजपा से नाता तोड़कर अलग रास्ता चुना। इन राज्यों में भाजपा बढ़ तो रही है, लेकिन पूरी तरह से पकड़ बनाने के लिये उसे जटिल और नयी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

अपनी बदली हुयी रणनीति के तहत भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने नक्सली आंदोलन की जन्मस्थली नक्सलबाड़ी में दलित आदिवासियों के साथ अधिक दिखे। उन्होंने एक रणनीति के तहत आदिवासी के घर को भोजन के लिए चुना और यह जताने का प्रयास किया कि भाजपा गरीबों की हितैषी है तथा उन्हें दोस्त की तरह अपनाना चाहती है। हालांकि जिस आदिवासी दंपति के घर श्री शाह ने भोजन किया था, वह बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गया, लेकिन भाजपा गरीबों के दिमाग में छाप छोडऩे में एक प्रकार से कामयाब रही।

भाजपा नेता इन दोनों राज्यों में लोगों की नौकरी दिला पाने में सरकार की विफलता को उजागर पर जोर दे रहे हैं। इसके साथ ही वे अलग-अलग स्टार्टअप और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं। वे लोगों से वादा भी कर रहे हैं कि भाजपा ही उनके कष्टों को कम कर पायेगी। त्रिपुरा के कमालपुर की महिला भाजपा नेता श्रीमती सपना दास कहती हैं कि वर्तमान समय में त्रिपुरा की राजनीति में भारी बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य में भारी संख्या में युवा मतदाता वामपंथी विचारधारा को छोड़कर भाजपा के साथ जुड़ रहे हैं। वह बताती है कि युवाओं के साथ ही सेवानिवृत्त शिक्षक, टैक्सी चालक और महिलाएं भी काफी संख्या में भाजपा के साथ जुड़ रही हैं

-वार्ता