स्वतंत्रता आंदोलन की समुद्री घटनाओं का इतिहास की पुस्तकों में जिक्र नहीं


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कोलकाता: प्रख्यात भारतविद संजीव सान्याल ने कहा है कि भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के समुद्री या तटीय घटनाओं को इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में उपयुक्त जगह कभी नहीं दी गई। प्रााचीन भारतीय इतिहास पर कई पुस्तकें लिख चुके सान्याल ने एक सेमिनार में इस बात का जिक्र किया कि कई सारी तटीय ऐतिहासिक घटनाएं हुई जिनका जिक्र इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में नहीं किया गया।

सेमिनार का आयोजन आईआईटी खडग़पुर ने किया था। उदाहरण के तौर पर सान्याल ने कहा कोलकाता में अशांति पैदा करने के लिए 1915 में क्रिसमस के दिन पूर्वी तट पर बंदूकों की तस्करी की गई। इसके बाद 1946 में रॉयल इंडियन नेवी का विद्रोह हुआ जिसमें 75 जहाजों पर 20,000 नाविकों ने विद्रोह किया था। 1946 की यह घटना स्वतंत्रा संघर्ष में एक निर्णायक क्षण था। उन्होंने प्राचीन भारत में ओडिय़ा – बंगाली समुद्रीय खोजकर्ताओं की यात्राओं का उदाहरण दिया और कहा कि इनका जिक्र हमारी इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में होना चाहिए था।

सान्याल ने कहा कि बालीजात्रा :बाली की यात्रा: की याद में एक रस्म है जब ओडि़शा में महिलाएं नवंबर महीने में केले के पेड़ के तने से बनी नौकाओं पर दीप जलाती हैं और उन्हें तैरने के लिए छोड़ देती हैं। यह सदियों पहले हमारे नाविकों की बाली के लिए की गई यात्राओं का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि कार्तिक (नवंबर) मास में जब पवन दक्षिण दिशा की ओर बहना शुरू करती हैं तो नौकाएं लंका और इंडोनेशिया के लिए यात्रा शुरू करती हैं तथा कुछ आखिरकार कंबोडिया, वियतनाम तक जाती हैं। इस तरह से भारतीय सभ्यता दक्षिण पूर्व एशिया के तटों तक पहुंची। हममें से कितने लोगों को इस बारे में जानकारी है।

(भाषा)