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अदालत में निर्भया के दोषी की अर्जी पर विचार होने के बीच मृत्युदंड पर बहस छिड़ी

‘मृत्युदंड का 21 वीं सदी में कोई स्थान नहीं है।’ संयुक्त महासचिव एंतोनियो गुतारेस का बयान भले ही सही लग रहा हो लेकिन 50 से अधिक देशों में अब भी मृत्युदंड की इजाजत है तथा निर्भया सामूहिक बलात्कार एवं हत्या कांड इसकी याद दिलाता है कि मौत की सजा को खत्म करने के मुद्दे का अबतक निपटारा नहीं हुआ है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार जो 50 देश अब भी मृत्युदंड को इजाजत देते हैं उनमें भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान,नाईजीरिया, अमेरिका, ईरान, जापान, कुवैत, बांग्लादेश, इराक, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात आदि आते हैं।

अमेरिका के गैर लाभकारी संगठन डेथ पेनाल्टी इंफोर्मेशन सेंटर कहता है कि 146 ऐसे देश हैं जिन्होंने कानून में इस प्रावधान एवं परिपाटी को पूरी तरह खत्म कर दिया है। भारत अतिवादी मामलों में ही अपराधियों को मृत्युदंड देता है और 1991 से अबतक 26लोगों को फांसी दी गयी है। आखिरी बार 2015 में 1993 के बम धमाके मामले के मुजरिम याकूब मेमन को फांसी दी गयी थी। उससे पहले संसद हमले के दोषी अफजल गुरू को 2001 में फांसी पर चढाया गया था।

मृत्युदंड भारत में चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि निर्भया सामूहिक बलात्कार-हत्याकांड के एक दोषी ने उच्चतम न्यायालय से उसे सुनायी गयी मौत की सजा की समीक्षा करने की दरख्वास्त की है। तीन न्यायाधीशों की पीठ दोषी अक्षय कुमार सिंह की अर्जी पर सुनवाई करेगी। उसके वकील ने समीक्षा याचिका में सवाल किया है कि जब बढ़ते प्रदूषण के चलते वैसे ही जिंदगी छोटी होती जा रही है, तो क्यों मृत्युदंड दिया जाए।

शीर्ष अदालत ने पिछले साल नौ जुलाई को इस मामले के तीन दोषियों--मुकेश (30), पवन गुप्ता (23)और विनय शर्मा (24) की समीक्षा याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि 2017 के फैसले की समीक्षा के लिए उन्होंने कोई आधार नहीं दिया है।

हैदराबाद में 25 साल की पशुचिकित्सक के साथ नृशंस बलात्कार और उसकी हत्या कर दिये जाने तथा उन्नाव में 23 वर्षीय बलात्कार पीड़िता को जला दिये जाने पर पूरे देश में जनाक्रोश फैलने पर बलात्कारियों को मृत्युदंड देने की मांग फिर चर्चा के केंद्र में है। उन्नाव की महिला ने सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया। हालांकि अधिकारवादी संगठनों ने मृत्युदंड का विरोध किया है। एमनेटस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि यह क्रूर, अमानवीय और अधोगतिकारक है।