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नई माताओं के लिए स्तनपान में तनाव एक बड़ी चुनौति, जानिए एक्सपर्ट की राय

शादी के पश्चात मां बनना हर लड़की का सपना होता है। हर लड़की चाहती है कि उसकी गोद में एक बच्चा हो, जिसे वह प्यार से खिलाए-पिलाए। मां बनना जहां सुखद अहसास होता है वहीं कम परेशानियों से भरा भी नहीं होता। हर मां को बच्चे को दूध पिलाना होता है। कहते हैं, मां का दूध बच्चे को पूर्ण रूप से पोषित करता है। जिस बच्चे को मां के दूध से पोषण नहीं मिल पाता, वह बच्चा कमजोर रहता है ऐसा माना जाता है, यानी लोग कहते हैं। 

हर बच्चे की मां के मन में सवाल होता है कि उसके बच्चे को दूध सही से मिल रहा है या नहीं? बच्चे को पोषण मिल रहा है या नहीं, बच्चे की तबीयत कैसी है, बच्चा हष्ट-पुष्ट है या नहीं, इन सभी सवालों के जवाब एक मां खोजना चाहती है। सुहानी (बदला हुआ नाम) के लिए मां बनना जहां एक अच्छा अहसास था, वहीं यह कम चुनौतीपूर्ण भी नहीं था, खासकर तब जब उन्हें अपने नवजात को दूध पिलाना होता था। उन्हें लगता था कि वह अपने बच्चे को पर्याप्त स्तनपान नहीं करा पा रही हैं और नवजात हर दो घंटे में स्तनपान के बावजूद बिलखता रहता था।

वैकल्पिक दूध पिलाने का फॉर्मूला देते थे लोग 

नयी-नयी मां बनने पर उन्हें जो खुशियां मिली थी, उसे जल्द ही अपराध बोध और बेबसी की भावनाओं ने घेर लिया, क्योंकि उनके आसपास का हर व्यक्ति उन्हें यह कहता था कि उन्हें अपने बच्चे को फॉर्मूला (वैकल्पिक) दूध देना शुरू करना चाहिए। तीस-वर्षीया महिला ने कहा, ‘‘यह मेरे लिए बहुत मुश्किल स्थिति थी। मैं बहुत तनाव में थी और मेरे ससुराल वालों के तानों ने हालात और बदतर कर दिए, जो ऐसे मजाक करते थे कि ‘एक दुधारू गाय तुमसे ज्यादा बेहतर होती।’ हालांकि ये चीजें मजाकिया लहजे में कही जाती थी, लेकिन इन बातों का मुझ पर इतना ज्यादा असर पड़ा कि मैं अपने बेटे को पर्याप्त स्तनपान नहीं करा पा रही थी और उसे बाद में गाय का और फॉर्मूला दूध पिलाना पड़ा।’’

सात अगस्त तक मनाया जाएगा अंतरराष्ट्रीय स्तनपान सप्ताह

विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय संयुक्त परिवार में हर दूसरी मां ऐसी भ्रांतियों का शिकार बनती हैं, जहां बच्चे के जन्म को लेकर खुशी में मां को नजरअंदाज कर दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तनपान सप्ताह के दौरान विशेषज्ञों ने इस पर जोर दिया कि नयी माताओं के लिए परिवार का सहयोग बहुत जरूरी है, क्योंकि वे बहुत ज्यादा मनोवैज्ञानिक और शारीरिक तनाव से गुजरती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तनपान सप्ताह सात अगस्त तक मनाया जाएगा।

द्वारका में एचसीएमसीटी मणिपाल हॉस्पिटल्स में स्तनपान विज्ञान की परामर्शक डॉ. साक्षी भारद्वाज ने कहा, ‘‘मैं यहां या अस्पताल के बाहर हर दूसरी मां को इस धारणा को लेकर परेशान देखती हूं कि वह अपने बच्चे को पर्याप्त स्तनपान नहीं करा पा रही हैं। किसी बच्चे का जन्म एक खुशी का अवसर होता है और नयी माताओं के लिए हर किसी के पास अपने-अपने सुझाव होते हैं। नयी माताओं के लिए यह समझना मुश्किल है कि उन्हें क्या करना चाहिए। ऐसा होता ही नहीं है कि कोई मां अपने बच्चे के लिए पर्याप्त दूध उत्पन्न नहीं कर सकती।’’

स्तनपान में तनाव एक बहुत महत्वपूर्ण कारक

चिकित्सकों का कहना है कि स्तनपान में तनाव एक बहुत महत्वपूर्ण कारक होता है। सी-सेक्शन के बाद दर्द और कई रातों तक नींद न आने की वजह से दूध की आपूर्ति पर असर पड़ता है। शालीमार बाग में फोर्टिस हॉस्पिटल में प्रसूति एवं स्त्री रोग की वरिष्ठ परामर्शक डॉ. उमा वैद्यनाथन ने कहा, ‘‘मैं उन्हें अपने मानसिक स्वास्थ्य एवं बच्चे की भलाई को प्राथमिकता देने और दूसरों की बातों पर ज्यादा ध्यान न देने की सलाह देती हूं। लेकिन संयुक्त परिवार में हमेशा यह संभव नहीं हो पाता है। मैं उन्हें बताती हूं कि स्तनपान न करा पाना बहुत दुर्लभ होता है और इसका संबंध तनाव से होता है।’’

चार साल के बच्चे की मां भारद्वाज ने कहा, ‘‘हम मां बनने वाली महिलाओं और उनके रिश्तेदारों को प्रसव से पहले बताते हैं कि बच्चे के रोने का हमेशा यह मतलब नहीं होता कि वह भूखा है। अगर कोई बच्चा भूखा है तो आपको उसके हावभाव देखने चाहिए जैसे कि वह अपने हाथों को मुंह के अंदर लेकर जाता है, चीजों को अपने मुंह में डालने की कोशिश करता है।’’