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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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सीएए से देश के मुसलमानों को कोई खतरा नहीं...

नई दिल्ली : जिस नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में दिल्ली में आगजनी और हिंसा हो रही है। वास्तव में मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ नहीं है यह कानून दिल्ली, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, लखनऊ, इलाहाबाद में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध की वजह यह है कि इसे मुस्लिमों के खिलाफ माना जा रहा है। लोगों में डर है कि इस बिल के चलते उनकी नागरिकता खतरे में पड़ जाएगी। 

कांग्रेस सहित कुछ प्रमुख विपक्षी दल इस कानून के खिलाफ है। इससे कानून के विरोध को हवा मिल रही है। इस बिल में देश के मुस्लिम नागरिकों के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। इस कानून से उनका कोई संबंध नहीं है। लेकिन, कुछ लोगों में यह डर है कि इस बिल की वजह से उनकी नागरिकता खतरे में पड़ जाएगी, जबकि ऐसा कुछ नहीं है। जो इस देश के नागरिक हैं, वह तो रहेंगे ही। वेबजह ही मुस्लिम समुदाय को भड़काया जा रहा है और वह राजनीति का शिकार हो रहे हैं।

राष्ट्रपति की मुहर के बाद बना कानून...संसद में पास होने और राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद नागरिक संशोधन कानून बन गया है। नागरिकता संशोधन कानून की मदद से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के कारण वहां से भागकर आए हिंदू, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। 

वे सभी भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे। सीएए में यह भी व्यवस्था की गयी है कि उनके विस्थापन या देश में अवैध निवास को लेकर उन पर पहले से चल रही कोई भी कानूनी कार्रवाई स्थायी नागरिकता के लिए उनकी पात्रता को प्रभावित नहीं करेगी। साथ ही ओसीआई कार्ड धारक यदि शर्तों का उल्लंघन करते हैं तो उनका कार्ड रद्द करने का अधिकार केंद्र को मिलेगा।

सीएए आखिर है क्या...

सर्दी बढ़ने से उत्तर भारत में पारा सामान्य से काफी नीचे आ गया है। लेकिन, नागरिकता संशोधन कानून के विरोध की आग ने माहौल गरमा दिया है। सियासत चरम पर है। लोगों में डर है। करीब एक हफ्ते से जारी विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है। 

सवाल है कि आखिर इस कानून का इतना विरोध क्यों हो रहा है? आइए इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश करते हैं। 'पंजाब केसरी' ने तय किया है कि वह कानून की वास्तविकता को जनता के सामने रखेगी।

विपक्षी कर रहे हैं झूठा प्रचार...

देश नागरिकता संसोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ जल रहा है। असम से शुरू हुआ यह आंदोलन अब राजधानी दिल्ली तक पहुंच चुकी है। जामिया से उठी यह आग मंगलवार को एकाएक सीलमपुर में धधक गया। लेकिन इन सब के बीच एक सवाल खड़ा होता है कि इस आंदोलन में शामिल भीड़ को पता है कि यह सीएए है क्या? 

इस बारे में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व पूर्व कार्यकारी परिषद (ईसी) सदस्य एके भागी का कहना है कि असम में लोगों को डर है कि बाहर के लोग वहां बसकर उनका हक छीन लेंगे, उनकी संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। वहीं जामिया और एएमयू में इस बात को लेकर प्रदर्शन हो रहा है कि मुस्लिमों की नागरकिता खतरे में है। इससे एक बात तो साफ है कि लोगों को सीएए और एनआरसी सही से समझ नहीं आया है। 

वहीं कुछ राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए तमाम तरह के भ्रम फैल रहे हैं। इससे हमें बचने की जरूरत है। बावजूद इसके सीएए को लेकर कोई संचय है तो इसपर बातचीत और संयम बरतने की जरूरत है, खासकर विद्यार्थियों को। हिंसा किसी भी मसले का हल नहीं है। साथ ही लोगों को यह समझना जरूरी है कि सीएए है क्या?

क्यों रखा गया है मुस्लिम को अलग...

प्रो. भागी ने बताया कि मुस्लिम धर्म के लोगों को इस कानून के तहत नागरिकता नहीं दी जाएगी, क्योंकि इन तीनों ही देशों में मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं, बल्कि बहुलता में हैं। मुस्लिमों को इसमें शामिल न करने के पीछे मोदी सरकार का तर्क है कि इन तीनों ही देशों में मुस्लिमों की बहुलता के चलते वहां धार्मिक आधार पर किसी मुस्लिम का उत्पीड़न नहीं हो सकता। 

इस बिल के तहत किसी अल्पसंख्यक को भारत की नागरिकता पाने के लिए कम से कम 6 तक भारत में रहना जरूरी है। सीएए के तहत बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। भारतीय मुसलमानों को इस कानून से घबराने की जरूरत नहीं है।

भारतीय बनने के लिए एक और मौका...

प्रो. एके भागी ने बताया कि लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि यह कानून नागरिकता देने की बात करती है न कि छीनने की। इसके तहत कुछ खास देशों से नागरिकों को भारत की नागरिकता देने के प्रावधान में ढील दी गई है। इस कानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता दी जा सकेगी। 

इसमें कोई भी हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने के नियमों में ढील देने का प्रावधान है। यानि जो शरणार्थी यहां बिना किसी सुविधाओं व अधिकार के बीते छह वर्षों से रह रहे हैं उन्हें सरकार नागरिकता के लिए एक मौका दे रही है।