दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को हैदराबाद के व्यवसायी सतीश बाबू सना की याचिका पर सीबीआई से जवाब मांगा। याचिका में सना ने रिश्वत संबंधी आरोपों में सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने से संबंधित एक मामले में अपना पक्ष रखने की अनुमति देने का अनुरोध किया है। सना प्राथमिकी में एक शिकायतकर्ता हैं।

न्यायमूर्ति नजमी वजीरी ने अस्थाना, सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और संयुक्त निदेशक ए.के शर्मा से भी सना की याचिका पर जवाब मांगा है। सना ने अस्थाना की याचिका में उसे भी एक पक्ष बनाये जाने का अनुरोध किया है। अस्थाना ने एक याचिका दायर करके प्राथमिकी को रद्द करने का आग्रह किया था।

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अदालत ने सना को 17 दिसंबर को सीबीआई के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया। इससे पहले सना ने एजेंसी को यह निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया था कि उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाए।

सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी और अधिवक्ता आर बेहुरा ने कहा कि इस मामले में सना शिकायतकर्ता हैं और उनके खिलाफ अब तक कोई दंडात्मक कदम के बारे में विचार नहीं किया गया है।

सीबीआई के वकील ने कहा कि सना को जांच में शामिल होने के लिए कहा गया था और कुछ समय पहले उन्हें एजेंसी के समक्ष पेश होने को कहा गया था लेकिन वह पेश नहीं हुए। सीबीआई ने कहा कि सना को पक्षकार बनाये जाने की जरूरत नहीं है।

सना की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने कहा कि उनकी शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी। वह जांच में एजेंसी की मदद कर रहे हैं और उन्हें भी सुना जाना चाहिए। अदालत ने मामले में आगे की सुनवाई के लिए 14 दिसंबर की तारीख तय की है।

सीबीआई के पुलिस उपाधीक्षक देवेन्द्र कुमार को सना के बयान रिकॉर्ड करने में जालसाजी के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। कुमार, मांस निर्यातक मोइन कुरैशी से जुड़े मामले में जांच अधिकारी थे। कुमार को 31 अक्टूबर को दिल्ली की एक अदालत ने जमानत दी थी।

इससे पूर्व की सुनवाई में अस्थाना ने उच्च न्यायालय में दावा किया था कि उनके तथा कुमार के खिलाफ रिश्वत मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के लिए सरकार से पूर्व मंजूरी लेने की आवश्यकता थी। उनके वरिष्ठ अधिकारी ने इसका जोरदार विरोध किया था।

अस्थाना की दलीलों का सीबीआई, वर्मा और संयुक्त निदेशक ए के शर्मा ने विरोध किया था। उनकी दलील थी कि किसी मंजूरी की जरूरत नहीं है क्योंकि दोनों अधिकारियों के खिलाफ आरोप उनके कर्तव्य के निर्वहन से संबंधित नहीं हैं या उनके द्वारा किए गए किसी फैसले या सिफारिश से जुड़े हुए नहीं हैं।