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18वीं सदी में भारत- फ्रांस संबंधों को दिखाने के लिए दिल्ली में प्रदर्शनी

अठारहवीं सदी में भारत और फ्रांस के संबंधों को रेखांकित करती हुई एक प्रदर्शनी दिल्ली में आयोजित की गई है। इसमें वर्ष 1750 से 1850 के बीच 12 भारतीय शासकों एवं उनके फ्रांसीसी भाषी अधिकारियों के जीवन को प्रदर्शित किया गया है। 

दर्शकों के लिए शुक्रवार को खोली गई इस प्रदर्शनी में पेरिस स्थित राष्ट्रीय पुस्तकालय (बिबिलोथेक्यू नेशनले) और नयी दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय के अभिलेखों, चित्रों एवं कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्शनी को ‘‘ राजा, नवाब और फिरंगी, फ्रांसीसी और भारतीय अभिलेखागार का खजाना (1750-1850)’’ नाम दिया गया है। यह प्रदर्शनी सात दिसंबर तक चलेगी। 

प्रदर्शनी में दुर्लभ पांडुलिपियों,चित्रों और कलाकृतियों को रखा गया है जो फ्रांसीसी भाषी अधिकारियों की नजर से भारतीयों की जिंदगी की जानकारी देते हैं। इन अधिकारियों में कुछ उच्च सैन्य पदों पर आसीन थे और उन्हें जागीर भी दी गई थी। 

प्रदर्शनी का आयोजन अलायंस फ्रांसेइस दी दिल्ली, द यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया और राष्ट्रीय संग्रहालय ने किया है। इसकी देखरेख सैम्युल बर्थेट कर रहे हैं। प्रदर्शनी की विषय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का भारतीय उपमहाद्वीप में उदय और फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की उनसे पराजय है। 

प्रदर्शनी के पहले हिस्से में 12 चित्र फ्रांसीसी अधिकारियों और उनके भारतीय शासकों की है जो मौजूदा केरल, पंजाब, बंगाल, अवध, दिल्ली, राजस्थान, पुणे, हैदराबाद और मदुरै के थे। 

दूसरे हिस्से में फ्रांसीसी राष्ट्रीय पुस्तकालय में संग्रहित भारतीय पवित्र किताबों को प्रदर्शित किया गया है। हिंदू धर्म के विभिन्न आयामों के अलावा इस्लाम, बौद्ध, तंत्र, जैन धर्म से जुड़ी पांडुलिपियों और प्राचीन पारसी धर्म से जुड़ी सामग्री को भी प्रदर्शित किया गया है। 

प्रदर्शनी में फ्रांसीसी यात्रियों फ्रांकोइस मलहर्वे, मुनुची बर्नियर या टैवेनियर के वृंतात शामिल है। 

फ्रांसीसी राजदूत एमैन्युअल लेनियन ने कहा, ‘‘यह प्रदर्शनी भारत-फ्रांस संबंधों के नए परिदृश्य को दिखाती है जिसमें 18वीं और 19वीं सदी के भारत-फ्रांस संपर्क के अनदेखे अभिलेखों को प्रदर्शित किया गया है। यह प्रदर्शनी आज की तरह विगतकाल में भी दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों की जड़ों को प्रदर्शित करता है।’’ 

अलायंस फ्रांसेइस द दिल्ली के निदेशक जीन फ्रांकोइस रैमन ने कहा, ‘‘ यह प्रदर्शनी अद्भुत सहयोग का नतीजा है। यह सामान्य बात नहीं है कि सांस्कृतिक संस्थान एक सैन्य क्षेत्र की संस्था से सहयोग करे।’’