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दिल्ली – एन. सी. आर.

कहीं ऐसा न हो...आधा शहर मानसिक परेशानियों को झेले

नई दिल्ली : कोई भी मास्टर प्लान बनाने से पहले उसके पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेंगे इस बात का भी ध्यान रखा जाए। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवायी के दौरान मास्टर प्लान में संशोधन को लेकर एक और महत्वपूर्ण बात कही कि कहीं ऐसा ना हो कि इसका ऐसा असर हो कि आधा शहर मानसिक परेशानियों को झेलने को मजबूर न हो जाए। ये टिप्पणी दिल्ली हाईकोर्ट की मुख्य बेंच ने की। हाईकोर्ट ने कहा कि शहरी क्षेत्र की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, जिसका प्रभाव सीधा-सीधा पर्यावरण पर पड़ रहा है पक्षियों की कई प्रजातियों को अब शहर में नहीं देखा जाता।

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायामूर्ति सी हरिशंकर की बेंच ने कहा कि दिल्ली से चिड़िया, कौऐ और काफी हद तक मैना भी गायब हो रही है। बेंच ने कहा कि जब आप एक क्षेत्र में मास्टर प्लान बदलकर रिहायशी इलाको में व्यावसायिक गतिविधियों की इजाजत देने है तो इससे आप आप बहुत सी चीजों पर सीधा सीधा असर डालते है। जिससे पर्यावरण भी प्रभावित होता है, मसलन वहां बिजली पानी सीवरेज सिस्टम पर तो दबाव पड़ता ही है साथ ही गाड़ियों की आवाजाही बढ़ने से वायु प्रदूषण का भी असर बढ़ता है। तो पॉलिसी बनाने वाले इस बात का ध्यान भी रखे के कहीं ऐसा न हो कि आपकी पॉलिसी के चलते दिल्ली की आधी आबादी को मानसिक समस्याओं से जूझना पड़ जाए। हाईकोर्ट ने ये बातें एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कही। इस याचिका में दिल्ली में बढ़ती बन्दरों और कुत्तों की संख्या का मुद्दा उठाया गया है।

गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने इससे पहले भी मास्टर प्लान में संशोधन की बात पर कई गंभीर सवाल खड़े किए थे। हाईकोर्ट ने कहा था कि कुछ लोग धरने पर बैठकर अपने हिसाब से मास्टर प्लान बदलवा सकते हैं। हाईकोर्ट ने कहा था कि कुछ लोगो ने शहर को फिरौती पर रखा हुआ है। कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए कहा कि बिना इस बात को ध्यान में रखे, बिना किसी की परवाह करते हुए संशोधन का प्रस्ताव किया जा रहा है। इस बदलाव का दिल्ली पर कितना प्रभाव पड़ेगा। पर्यावरण को लेकर इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी इसकी किसी को कोई परवाह नहीं है। दरअसल, दिल्ली में मौजूदा समय में सीलिंग की कार्रवाई को रोकने के लिए मास्टर प्लान 2021 में संशोधन का प्रस्ताव किया है जिससे रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों की इजाजत दी ता सके। हाईकोर्ट इसको लेकर पहले भी सख्त रूख अपना चुका है।

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