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संत रविदास का मंदिर तोड़े जाने पर सियासत गरमाई

नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी (आप) ने तुगलगाबाद स्थित संत रविदास का वर्षों पुराना मंदिर तोड़ने का डीडीए पर आरोप लगाया है। आप ने कहा है कि डीडीए के इस कदम का पूरे देश में विरोध हो रहा है। डीडीए ने 10 तारीख को सुबह 10 बजे इस मंदिर को तोड़ दिया था और डीडीए वाले यहां की मूर्ति उठाकर ले गए हैं। आम आदमी पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मंदिर को पुन:स्थापित करने की मांग की। 

आम आदमी पार्टी मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में दिल्ली सरकार में समाज कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने पूरी घटना की जानकारी देते हुए बताया कि सिकंदर लोधी के समय से  संत रविदास यहां आए थे और उन्होंने यहां आश्रम बनवाया था। यहां एक तालाब भी था, जो सरकारी दस्तावेजों में भी उल्लेखित है। उसके बाद भी डीडीए ने उस मंदिर को तोड़ दिया और डीडीए वाले मूर्ति को उठाकर ले गए। इस मुद्दे पर आज हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखा है कि करोड़ों लोग देश में संत रविदास जी पर आस्था रखते हैं। 

यहां के लोगों की आस्था का ख्याल रखते हुए मंदिर को पुन: स्थापित कराए। लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। गौतम ने कहा कि हम चाहते हैं कि हमारी बात सुनी जाए और मंदिर फिर से बनाया जाए, अन्यथा इसके लिए आंदोलन की जरूरत पड़ी तो पीछे नहीं हटेंगे। आप पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि डीडीए लोगों को जमीन बांट रहा है, उसे 100 गज जमीन भी संत रविदास जी के मंदिर के लिए देना मुश्किल हो गया है और भाजपा के नेता आज चुप बैठे हैं। इस मौके पर विधायक राखी बिड़ला और विधायक मनोज कुमार भी मौजूद रहे। उधर डीडीए के अधिकारियों ने बताया कि जमीन को लेकर मामला लंबे समय से कोर्ट में चल रहा था। 

हाईकोर्ट के निर्णय के बाद समिति ही मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने ही समिति को जमीन डीडीए को सौंपने का आदेश दिए थे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जमीन नहीं सौंपने पर 13 अगस्त को समिति के सभी पदाधिकारियों को कोर्ट में पेश होने के आदेश जारी किए थे। इस संबंध में दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव, पुलिस आयुक्त और समिति को नोटिस भेजे गए थे। इसके पहले ही समिति की तरफ से जमीन डीडीए को सौंप दी गई। शनिवार को 100 वर्ग मीटर जमीन पर बना स्ट्रक्चर डीडीए ने हटाया।

मंदिर तोड़ने का मामला सरकार के समक्ष उठाएंगे: बादल

शिरोमणी अकाली दल के अध्यक्ष सरदार सुखबीर सिंह बादल ने तुगलगाबाद, दिल्ली में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा गुरु रविदास का ऐतिहासिक मंदिर गिराने की निंदा की है। उन्होंने कहा कि मंदिर के लिए अकाली दल केस की कानूनी लड़ाई में सहायता करने तथा ऐतिहासिक मंदिर के पुनर्निर्माण का खर्चा उठाने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि गुरु रविदास की बाणी गुरु ग्रंथ साहिब का अभिन्न अंग है, अकाली दल धार्मिक गुरुओं की बेअदबी बर्दाश्त नहीं करेगा। इसलिए हम इस मामले को शीघ्र ही भारत सरकार के पास उठाएंगे। 

उन्होंने कहा कि गुरु रविदास के पंजाब तथा पंजाब से बाहर रह रहे लाखों श्रद्धालुओं के विश्वास तथा आस्था का विषय है। इस घड़ी में अकाली दल पूरी तरह गुरु रविदास के श्रद्धालुओं के साथ खड़ा है। अकाली दल अध्यक्ष ने यह मामला गृहमंत्री अमित शाह के पास उठाकर इसका अतिशीघ्र समाधान निकलवाने का आश्वासन दिया।

तथ्यों को नजरअंदाज किया... 

डीएसजीएमसी के पूर्व अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके ने कहा कि ऐतिहासिक रविदास मंदिर को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तोड़ने से पहले ऐतिहासिक तथ्यों को डीडीए ने नजरअंदाज किया है। उन्होंने कहा कि मंदिर के पुनर्निर्माण की मांग का वह समर्थन करते हैं। जीके ने कहा कि भक्त रविदास को सिख रोजाना नतमस्तक होते हैं। 

क्योंकि रविदास की उच्चारण की हुई बाणी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है। रविदास भारतीय समाज के महान सुधारक थे। यही कारण है कि जब गुरु अर्जन देव ने आदि ग्रंथ के लिए बाणी का संकलन किया तो दलित समाज से आते रविदास व भक्त कबीर की रचनाओं को भी गुरुओं की रचनाओं के बराबर स्थान दिया।

रविदास समाज के सम्मान की बहाली तक लड़ेंगे  

दिल्ली के तुगलगाबाद में भगवान रविदास के मंदिर को तोड़ने पर विश्व हिंदू परिषद ने अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। विहिप के अंतर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार ने कहा है कि हिंदुओं के आराध्य भगवान रविदास के भव्य मंदिर को तोड़कर दिल्ली सरकार ने जो दुस्साहस किया है, विश्व हिंदू परिषद उसकी कठोरतम शब्दों में निंदा करती है तथा रविदासी समाज के सम्मान की बहाली तक इस आंदोलन को साथ लड़ने का संकल्प लेती है। 

विहिप कार्याध्यक्ष ने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार ने न्यायालय के निर्णय की आड़ में दशकों पुराने रविदास समाज के पुण्य स्थल को तो गिरा दिया किन्तु दिल्ली की ही अनेक अदालतों द्वारा जारी आदेशों की अनुपालना में कई मज़ारों व मस्जिदों को, जिन्हें अवैद्य पाया गया था, हाथ तक लगाने की हिम्मत नहीं की, आखिर क्यों?