नई दिल्ली : आजादी के 71 वर्ष हो चुके पर आज भी कोर्ट की कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में होती है। यह बात उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने अतिरिक्त सालिसिटर जनरल पिंकी आनंद और गौरी गोवर्धन द्वारा लिखी किताब ट्रेल्स ऑफ ट्रुथ के विमोचन के दौरान कही। वहीं उन्होंने ट्रेल्स ऑफ ट्रुथ किताब को लेकर लेखक को बधाई दी। इस दौरान उन्होंने कोर्ट के अंदर मातृभाषा के उपयोग की वकालत की। उपराष्ट्रपति ने कहा कि मातृभाषा आम जनता तक सरलता से पहुंचती है। मातृभाषा में हम किसी भी बात को बखूबी से व्यक्त कर सकते हैं और अपनी बात को सरलता से जन-जन तक पहुंचा सकते हैं।

उन्होंने कोर्ट या अन्य सार्वजनिक जगहों पर हमें अपनी मातृ भाषा का उपयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोर्ट में कई बार ऐसा होता है कि अंग्रेजी भाषा के उपयोग के चलते शिकायतकर्ता चल रही कार्यवाही को नहीं समझ पता है। मातृ भाषा में कार्यवाही होने से वह शख्स भी आसानी से समझ सकता है। उपराष्ट्रपति ने उदाहरण देते हुए कहा कि जितने विदेशी मेहमान आते हैं वह सब लगभग अपनी मातृ भाषा में ही बात करते है तो हम लोग अपनी मातृभाषा में क्यों नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री व अन्य मंत्री अक्सर अपनी मातृ भाषा में बात करते हैं।

फैसले करने में गति लाना होगा…
उपराष्ट्रपति ने कहा कि बदलते टेक्नोलॉजी के साथ न्याय पालिका को फैसले देने में तेजी लाना चाहिए। देश के लोगों न्याय पालिका में काफी आस्था है। उन्होंने कहा कि हम लोग नये युग में रह रहे हैं और देश में अधिकतर लोग युवा हैं। इसके अलावा उन्होंने कहा कि यंग इंडिया तेजी से फैसले चाहता है।

समाज के लिए किताब : पिंकी… ट्रेल्स ऑफ ट्रुथ की लेखिका पिंकी आनंद ने किताब के विमोचन के दौरान कहा कि अभी तक कानून पर कई किताब लिखी है। लेकिन यह किताब अब तक कि लिखी किताबों में से सबसे अलग है। उन्होंने किताब सिविल सोसाइटी के लिए लिखी गई है। समाज काफी बदल गया है और तेजी से बदला है। इस दौरान उन्होंने बिरला नंद केस, प्रियदर्शिनी मट्टू, निर्भय आदि केस में सिविल सोसाइटी के योगदान की सराहना की।

इन पांचों बातों को नहीं भूलना चाहिए
उपराष्ट्रपति ने कार्यक्रम के दौरान कहा कि हमें पांच बातों को कभी नहीं भूलना चाहिए। मां, पैतृक स्थान, मातृभाषा, मातृ भूमि और​ गुरु जिसने हमें शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी के साथ बदलवा आना जरूरी है। साथ ही कहा कि गूगल काफी उपयोगी है लेकिन वह कभी गुरु नहीं बन सकता है। ज्ञान और सही मार्गदर्शन केवल एक गुरु ही दे सकता है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि मातृभाषा हमारी आंख हैं और दूसरी भाषा हमारा चश्मा है।

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