नई दिल्ली: यह बात तो सब जानते हैं कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों पर दिल्ली सरकार द्वारा पैसा खर्च किया जाता है लेकिन एक बच्चे पर कितना पैसा खर्च होता है इसकी जानकारी बहुत कम लोगो को है। प्रति बच्चे पर खर्च होने वाली राशि की जानकारी लेने के लिए शिक्षा विभाग में एक आरटीआई लगाई गई तो एक चौंकाने वाली बात सामने है। आरटीआई में यह पाया गया कि जहां वर्ष 2015-2016 में प्रति बच्चे पर खर्च होने वाली राशि एकसमान 1100 रुपये थी, वहीं यह 2017 में लगभग 50 प्रतिशत बढ़कर 1800 से 2000 रुपये तक पहुंच गई। दो लगातार वर्षों में एक समान राशि होना और अगले ही साल इसका दोगुना या 50 प्रतिशत बढ़ जाना, शिक्षाविदों को कुछ अटपटा सा लगता है।

हैरानी तो इस बात की है कि जिस आरटीआई का जवाब शिक्षा विभाग को देना चाहिए था, उसका जवाब अलग-अलग स्कूल द्वारा दिया जा रहा है। पब्लिक प्रोटेक्शन मूवमेंट ऑर्गनाईजेशन के राष्ट्रीय सलाहकार विवेक थपलियाल द्वारा लगाई गई आरटीआई को शिक्षा विभाग ने अलग-अलग स्कूलों में भेज दिया और इसका जवाब देने के लिए कहा। इस पर कई शिक्षक समूह और शिक्षाविदों का कहना है कि शिक्षा विभाग सही जानकारी न देने के लिए इसे सभी स्कूलों में भेज देता है जबकि इसका पूरा ब्यौरा शिक्षा विभाग के पास होता है न कि स्कूलों के पास। हालांकि आरटीआई में अभी कुछ ही स्कूलों की तरफ से जवाब आया है और बाकी स्कूलों का जवाब आना बाकी है।

जहां बढ़ने की बजाय घट गया खर्च
जहां एक तरफ कुछ स्कूलों में खर्च लगभग 50 प्रतिशत बढ़ गया, वहीं एक स्कूल ऐसा भी हैं जहां खर्च बढऩे की बजाय कम हुआ है। बदरपुर के राजकीय बालिका वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय नंबर-3 में खर्च बढ़ा नहीं बल्कि घट गया है। स्कूल द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 3015-16 में इस स्कूल में पढऩे वाले प्रति बच्चे पर औसतन 2200 रुपये खर्च किए गए थे जिसमें पुस्तकें,यूनिफॉर्म और विभिन्न छात्रवृत्तियां आदि शामिल थीं। वहीं वर्ष 2017 आते-आते प्रति बच्चा खर्च 2200 से घटकर 1750 हो गया। अब ऐसे में यह अनुमान लगाना कि किस स्कूल द्वारा सही जानकारी दी गई और किस के द्वारा गलत, बेहद मुश्किल है। इसका सही जवाब तब ही मिल पाता जब शिक्षा विभाग स्वयं इस जवाब की जिम्मेदारी लेता क्योंकि इसका सही ब्यौरा शिक्षा विभाग के फाइनेंस विभाग के पास ही होता है लेकिन शिक्षा विभाग ने स्वयं इसकी जानकारी देना सही नहीं समझा।

आखिर क्यों बढ़ा खर्च… राजकीय विद्यालय शिक्षक संघ के महासचिव अजयवीर यादव के मुताबिक शिक्षा विभाग और दिल्ली सरकार द्वारा शिक्षकों को ट्रेनिंग के लिए विदेशों में भेजना, सेमिनार करवाना, मेंटर टीचर पर पैसा खर्च करना आदि पैसे का हिसाब बच्चों में विभाजित कर दिया जाता है ताकि यह दिखाया जा सके कि वह बच्चों पर अधिक राशि खर्च कर रहे हैं, जबकि बच्चों पर इतना पैसा खर्च ही नहीं किया जाता। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग कभी भी आरटीआई के जवाब में सही जानकारी नहीं देता इसलिए वह सभी स्कूलों को इसका जवाब देने के लिए आदेश देता है और स्कूलों की तरफ से आनुमानित जवाब दिए जाते हैं क्योंकि प्रति बच्चे पर खर्च होने वाली राशि की जानकारी स्कूल के पास नहीं बल्कि शिक्षा विभाग के फाइनेंस विभाग के पास होती है। वहीं जो पैसा पायलट प्रोजेक्ट आदि में लगाया गया है उसे भी बच्चों के प्रति खर्च में जोड़ दिया गया है इसलिए प्रति बच्चा खर्च बढ़ता जा रहा है।

– सिमरनजीत सिंह