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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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अर्थव्यवस्था में ‘किसान’

चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई से सितम्बर) तक के जो आर्थिक आंकड़े निकल कर आये हैं उनमें इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था में 7.5 प्रतिशत की गिरावट आयी जो पिछली तिमाही की गिरावट 23.9 प्रतिशत से काफी कम है मगर इसमें प्रसन्न होने का भी जरा सा कारण नहीं है क्योंकि अभी तक समूची आर्थिक प्रणाली नकारात्मक सांचे में ही घूम रही है, परन्तु केवल एक तथ्य प्रसन्नता योग्य है कि कृषि क्षेत्र ने पिछली तिमाही की तरह इस तिमाही में भी 3.4 प्रतिशत की बढ़ौतरी की है। जाहिर ही पिछली तिमाही कोरोना संक्रमण के विनाशकारी दौर की तिमाही थी और आलोच्य तिमाही लाॅकडाऊन समाप्त होने अग्रिम त्यौहारी मांग बढ़ने की तिमाही थी। जिसकी वजह से इस दौरान उत्पादन के क्षेत्र में भी एक प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे यह उम्मीद तो जगी है कि बाजार में मांग बढ़ रही है मगर वह इस हद तक नहीं जा सकती कि पूरा वित्तीय वर्ष सकारात्मक खांचे में जा सके, विद्वान अर्थशास्त्रियों के अनुसार चालू पूरे वित्त वर्ष के दौरान अगले साल मार्च के अंत तक विकास वृद्धि की दर नकारात्मक सांचे में 9 प्रतिशत से ऊपर ही रहेगी।

बेशक इसकी मुख्य वजह कोरोना संक्रमण कही जा सकती है मगर 2018-19 में विकास दर के चार प्रतिशत से थोड़ा ऊपर रहने पर आशंका जताई जाने लगी थी कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए वृद्धि कारक कारगर कदम उठाये जाने चाहिएं परन्तु भारत का कृषि क्षेत्र जिस प्रकार आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के चक्र में अपनी अन्दरूनी ताकत के भरोसे लगातार अपना उत्पादन बढ़ा रहा है उससे इस देश के किसानों की उद्यमशीलता को परखा जा सकता है, परन्तु इसके विपरीत यह भी तथ्य है कि किसानों की आमदनी में बाजार की अन्य उपभोक्ता मूलक वस्तुओं की तुलना में इजाफा नहीं हुआ है। एेसा किसान का लागत मूल्य बढ़ने की वजह से हुआ है। कृषि उत्पादन हेतु उसका लागत मूल्य जिस प्रकार बढ़ा है उसके अनुपात में उसके उत्पादन मूल्य में वृद्धि नहीं हुई है।

किसान की प्रमुख उपजों  के उत्पादन मूल्य की गारंटी सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करके देती रही है। यह व्यवस्था किसान के लिए सुरक्षा कवच का काम इस तरह करती रही है कि मंडी समितियों के माध्यम से वह इन घोषित मूल्यों काे प्राप्त करने का अधिकार पाता रहा है। हालांकि किसान मंडी समिति से बाहर निजी व्यापारियों को अपनी फसल औने-पौने दाम पर भी नकद रोकड़ा की जरूरत में बेचते रहे हैं मगर इसके बावजूद न्यूनतम समर्थन मूल्य उनकी उपज के मूल्य का आधार भाव तय करता रहा है। उसके हाथ में मंडी समिति कानून का अस्त्र इस तरह रहा है कि अगर वह चाहे तो अपनी उपज को केवल समर्थन मूल्य पर ही बेचे। कृषि मंत्री पद पर रहते हुए शरद पवार मंडी समिति (एपीएमसी) कानून लाये थे तो उन्होंने संसद में घोषणा की थी कि इस कानून की मार्फत किसानों को आर्थिक संरक्षण इस प्रकार मिलेगा कि उन्हें अपनी फसल की निजी व्यापारियों द्वारा लूट का अन्देशा  नहीं रहेगा। राज्य सरकारें इस कानून को लागू करके अपने राज्यों में मंडी समितियां विकसित करके उनकी फसल के निकटतम स्थल पर बिकने की सुरक्षा न्यूनतम समर्थन मूल्यों पर देंगी। चूंकि कृषि मूलतः राज्यों का विषय है। अतः राज्य सरकारें इस कानून को लागू करने या न करने के लिए स्वतन्त्र होंगी। जो लोग इस प्रणाली को संरक्षण वादी अर्थव्यवस्था का अंग मानते हैं वे गलती पर हैं कि किसान की उपज का बाजार खरीदार का बाजार नहीं  होता बल्कि बिकवाल का बाजार होता है और अर्थशास्त्र का कक्षा दस का विद्यार्थी भी यह जानता है कि जो बाजार बिकवाल का बाजार होता है वह हमेशा भाव गिरा कर खरीदारी करता है। अतः कृषि उपजों के लिए समर्थन मूल्य का तर्क समझा जा सकता है।

 खेती का कार्पोरेटीकरण करके हम इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते हैं क्योंकि उस स्थिति में अपनी धरती का मालिक छोटा किसान कार्पोरेट जगत का चाकर बन जायेगा और उसका वह आर्थिक सुरक्षा चक्र समाप्त हो जायेगा जो सदियों से भारत में आढ़तियों और किसानों के बीच रहा है। आढ़ती प्राचीनकाल से ही किसानों के ‘एटीएम’ इस प्रकार रहे हैं कि हर आड़े वक्त और ‘हारी-बीमारी’ के समय  दोनों के बीच के आर्थिक रिश्ते मजबूत सामाजिक सेतु की तरह एक-दूसरे की साख रखते रहे हैं। इसका विकल्प बैंकिंग ऋण प्रणाली छोटे किसानों के सम्बन्ध में इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि दोनों ही पक्ष केवल दी गई जुबान या वचन पर यकीन करके काम करते हुए जरूरत पड़ने पर लिखा-पढ़ी केवल किसान की फसल के आधार पर करते हैं।  यह इस कृषि प्रधान देश भारत की जमीनी हकीकत है। मंडी समिति कानून आ जाने के बावजूद यह तन्त्र अटूट रहा जिसकी वजह से किसानों का गुस्सा समझा जा सकता है कि क्यों वे नये कृषि कानूनों के प्रति आशंकित हैं। इसके साथ हमें यह भी समझना पड़ेगा कि भारत में कृषि क्रान्ति इस क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ने की वजह से ही साठ के दशक में आयी थी और आज यह अनाज उत्पादन में न केवल आत्मनिर्भर है बल्कि निर्यात करने वाला देश है। इसके पीछे हमारे किसानों का ही मुख्य योगदान है विशेषकर संयुक्त पंजाब व प. उत्तर प्रदेश के किसानों का, जिनकी देखा देखी अन्य राज्यों के किसानों को भी प्रेरणा मिली।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले ही कह चुके हैं कि  मंडियां खत्म नहीं होंगी और एमएसपी पर खरीद जारी रहेगी। दिल्ली की सीमाओं पर अड़े किसान केवल मंडी से बाहर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी चाहते हैं। अब किसान प्रतिनिधियों और केन्द्र में वार्ता शीघ्र होने के आसार हैं क्योंकि किसी भी समस्या का समाधान वार्ता ही है। उम्मीद है कि कोई न कोई रास्ता निकलेगा।