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धर्मनिरपेक्ष भारत में ‘कट्टरता’

भारत एक भौगोलिक सीमा की संप्रभुता वाला ऐसा देश है ( टेरीटोरियल स्टेट) जिसके किसी भी भाग में रहने वाला किसी भी धर्म का अनुयायी भारतीय नागरिक है चाहे वह किसी भी संस्कृति या रीति-रिवाजों का मानने वाला हो। भारत की यही विविधता सभी भारतीयों को आपस में इस प्रकार जोड़ती है कि  विविध भाषा-भाषी और बहुधर्मी होने के बावजूद उनकी निष्ठा भारत राष्ट्र के प्रति सर्वोपरि इस प्रकार रहे कि उनकी पहली पहचान भारतीय ही हो। इसे सुनिश्चित करने के लिए आजादी के बाद भारतीय संविधान की रचना की गई जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि भारत के हर नागरिक के मूल अधिकार बराबरी के आधार पर होंगे। इनमें सबसे बड़ा अधिकार ‘एक वोट’ का दिया गया। इसमें न तो किसी उद्योगपति से लेकर एक मजदूर के बीच और न ही किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर से लेकर किसी निरक्षर व्यक्ति के बीच कोई भेदभाव किया गया। एक हजार साल के लम्बे समय तक गुलाम रहने के बाद भारत के लोगों को मिले इस एक वोट के समानाधिकार को ‘राजनीतिक आजादी’ कहा गया।

 स्वतन्त्र भारत में हर पांच साल बाद वयस्क मतदाताओं को अपने इसी एक वोट के इस्तेमाल से अपनी मनपसन्द की सरकार गठित करने का अधिकार मिलने से सबसे बड़ी समस्या उनके वोटों को धर्म, जाति, पंथ, क्षेत्र, वर्ग, समुदाय, सांस्कृतिक विशिष्टता व भाषा आदि के नाम पर गोलबन्द करके राजनीतिक लाभ उठाने से पैदा हुई। इससे राष्ट्रीय अस्मिता का भाव कुछ विशेष सम्प्रदायों में वह स्थान पाने में पिछड़ने लगा जिसका निर्देश भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है। स्वतन्त्र भारत को ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश घोषित किया गया और भाषाई अल्पसंख्यकों से लेकर धार्मिक अल्पंसख्यकों को कुछ विशेषाधिकार भी दिये गये जिससे वे अपनी संस्कृति के अनुसार अपना जीवन यापन कर सकें। इसमें इनके अपने शिक्षण संस्थानों का विशिष्ट अधिकार भी दिया गया। इन शिक्षण संस्थानों में ये अल्पसंख्यक अपने धर्म व संस्कृति के अनुसार विद्यार्थियों को शिक्षा दे सकते हैं। दूसरे संविधान ने ही शिक्षा जैसे विषय को ‘राज्यों का विषय’ बनाने की व्यवस्था की। इस प्रणाली का असर हमें आज आजादी के 75वें वर्ष में जो देखने को मिल रहा है वह यह है कि शिक्षा के प्राथमिक स्तर से ही भारतीयों में धार्मिक मान्यताओं को लेकर संस्थागत रूप से अलगाव पैदा हो चुका है। संभवतः इसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने 75 साल पहले इसलिए न की हो कि अल्पसख्यकों को स्वतन्त्र रूप से अपनी धार्मिक शिक्षा को पाने का अधिकार होना चाहिए और शिक्षा को राज्यों का विषय बनना चाहिए क्योंकि प्रत्येक राज्य की अपनी सांस्कृतिक पहचान होती है। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि भारत में ‘उप-राष्ट्रीयताओं’ की भी एक लम्बी शृंखला है। जैसे मराठी, पंजाबी, बंगाली, कन्नड़, तमिल व कश्मीरी आदि। इन सभी उप-राष्ट्रीयताओं को भारत राष्ट्र की मुख्य राष्ट्रीयता से बांधने का प्रभावशाली जरिया केवल शिक्षा ही हो सकता है। जिस प्रकार हमने स्वतन्त्र भारत में अखिल भारतीय प्रशासनिक व पुलिस सेवा से लेकर वन सेवा तक की नींव डाली उसी प्रकार पूरे भारत में प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर तक एक समान शिक्षण पाठ्यक्रम को यदि लागू किया गया होता तो हमारे सामने आज ‘मजहबी जेहाद’ जैसी समस्या नहीं आती। 

एक तो भारत के मुसलमान नागरिकों को आजादी के बाद से ही नागरिक आचार संहिता के मामले में अपने धर्म के कानून ‘शरीया’ का आंशिक (घरेलू मामलों में ) रूप से पालन करने की छूट देकर हमने सामाजिक स्तर पर ही धार्मिक पहचान को विशिष्टता प्रदान कर दी और दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता के अति उत्साह में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में धार्मिक निर्देशों के अनुसार शिक्षा प्रदान करने की छूट भी प्रदान कर दी। इससे भारत के ‘टेरीटोरियल स्टेट’  होने पर भी लक्षद्वीप से लेकर असम तक के भारतीय नागरिक और हिन्दू से लेकर मुसलमान नागरिक तक के बीच में मजहब की शिक्षाओं का असर बना रहा। क्या वजह है कि इस्लामी मदरसों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए आजादी के बाद अब यह कुछ राज्यों में नियम बनाया जा रहा है कि मदरसा खुलने पर सबसे पहले वह ‘राष्ट्रगान’ का उवाच करेंगे? मदरसों समेत अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रमों की समीक्षा करने का अधिकार सरकारों को क्यों नहीं दिया गया ? जिससे वे यह सुनिश्चित कर सकें कि पाठ्यक्रम का प्रारूप भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से पूर्णतः मेल खाता है कि नहीं। संविधान में धार्मिक स्वतन्त्रता व्यक्तिगत आधार पर दी गई है। इसका मतलब यह होता है कि धर्म किसी भी नागरिक का निजी मामला है। अपने धर्म की शिक्षा वह अपने घर में ही प्राप्त कर सकता है इस पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। परन्तु जब हम छोटे से बालक को ही धार्मिक शिक्षण संस्थाओं में भेजते हैं तो उसमें बालपन से ही मजहबी मानसिकता का विकास होने लगता है। यह बहुत स्वाभाविक मनोविज्ञान है। यही बालक यदि पूरे भारत मे एक समान रूप से लागू शिक्षण पाठ्यक्रम का अध्ययन करेगा तो उसमें राष्ट्रीयता का भाव सर्वोपरि स्तर पर जमेगा। भारत की विविधता में एकता के भाव को पैदा करने के लिए बहुत आवश्यक है कि हर प्रदेश और मजहब के बालक को एक समान शिक्षा प्रदान की जाये और मजहब को उसका निजी मामला बताया जाये। मूल प्रश्न तो यही है कि धार्मिक कट्टरता के उपजने का क्या कारण है? यह कैसे भूला जा सकता है कि बालपन में पाई गई शिक्षा से ही संस्कार पैदा होते हैं और इन संस्कारों मे अगर हम ‘राष्ट्र सर्वोच्च’  घोल देंगे तो धार्मिक कट्टरता को कहां स्थान मिलेगा? कोई भी मनुष्य पृथ्वी पर ईश्वर या अल्लाह के आगे यह अर्जी देकर पैदा नहीं होता कि वह हिन्दू या मुसलमान बनेगा। उसका जन्म स्त्री-पुरुष के बीच की एक वैज्ञानिक शारीरिक क्रिया से होता है। अतः जो जिस धर्म मानने वाले के यहां पैदा हो गया, वही बन गया। कट्टरता तो उसमें इस जमीन पर रहने वाले खुद को मजहब का ठेकेदार कहने वाले लोग ही भरते हैं।